Heat Tolerance: जैसे-जैसे दुनिया के कई हिस्सों में तापमान बढ़ता जा रहा है लू और इंसानों की गर्मी सहने की क्षमता पर चर्चा और भी ज्यादा जरूरी होती जा रही है.  दिलचस्प बात यह है कि विज्ञान बताता है कि पुरुष और महिलाएं गर्मी को बिल्कुल एक ही तरह से महसूस नहीं करते. शोधकर्ताओं ने यह पाया है कि शरीर की बनावट, पसीना आने के तरीके, मेटाबॉलिज्म और हार्मोन में अंतर यह सभी इस बात पर असर डालते हैं कि शरीर ज्यादा तापमान पर कैसी प्रतिक्रिया देता है.

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पुरुषों को आमतौर पर ज्यादा जल्दी पसीना आता है 

सबसे बड़े जैविक अंतरों में से एक शरीर के कूलिंग सिस्टम में होता है. गर्मी के संपर्क में आने पर पुरुष आमतौर पर ज्यादा तेजी से और ज्यादा मात्रा में पसीना निकालते हैं. इससे शरीर को तेजी से ठंडा होने में मदद मिलती है. खासकर गर्म और शुष्क मौसम की स्थितियों में जहां पसीना आसानी से भाप बनकर उड़ जाता है. पसीना निकलने की इस मजबूत प्रक्रिया के कारण पुरुष अक्सर काफी ज्यादा गर्मी या फिर शारीरिक गतिविधि के दौरान अपने शरीर का तापमान ज्यादा तेजी से कम कर पाते हैं. दूसरी तरफ महिलाओं को आमतौर पर पसीना कम आता है. भले ही उनके शरीर में पसीने की ग्रंथियों की संख्या पुरुष जितनी ही हो.

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महिलाएं अक्सर नमी वाली गर्मी को ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल पाती हैं 

हालांकि महिलाओं को कुल मिलाकर पसीना कम आता है लेकिन कुछ स्टडीज से यह पता चलता है कि गर्म और नमी वाली स्थितियों में उनका शरीर थर्मल संतुलन ज्यादा प्रभावी ढंग से बनाए रख पाता है. क्योंकि नमी वाले वातावरण में पसीने की कम मात्रा भी ज्यादा आसानी से भाप बनकर उड़ सकती है इस वजह से ज्यादा देर तक गर्मी में रहने पर भी महिलाएं कभी-कभी पुरुषों की तुलना में शरीर के तरल पदार्थ को ज्यादा बेहतर तरीके से बचा पाती हैं. 

मांसपेशियां बड़ी भूमिका निभाती हैं 

शरीर की बनावट भी गर्मी सहने की क्षमता पर काफी असर डालती है. पुरुषों में आमतौर पर मांसपेशियों का द्रव्यमान काफी ज्यादा होता है. मांसपेशियां स्वाभाविक रूप से गर्मी पैदा करती हैं. तब भी जब शरीर आराम कर रहा होता है. वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि शरीर द्वारा पैदा की जाने वाली कुल गर्मी में मांसपेशियों का योगदान लगभग 25% होता है. यही वजह है कि पुरुषों को अक्सर ज्यादा जल्दी गर्मी महसूस होती है क्योंकि उनका शरीर अंदरुनी तौर पर ज्यादा गर्मी पैदा करता है.

महिलाओं में आमतौर पर मांसपेशियों का द्रव्यमान कम होता है. इसी के साथ उनका रेस्टिंग मेटाबॉलिक रेट भी काम होता है. इसका मतलब है कि उनका शरीर पुरुषों की तुलना में अंदरूनी तौर पर कम गर्मी पैदा करता है. 

हार्मोन का प्रभाव 

हार्मोनल उतार-चढ़ाव महिलाओं की उष्मा प्रतिक्रिया को प्रभावित करने वाले कारण है. मासिक धर्म चक्र, गर्भावस्था और मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन में परिवर्तन शरीर के तापमान विनियमन को बदल सकते हैं. उदाहरण के लिए ओव्यूलेशन के बाद एक महिला के शरीर का मूल तापमान  स्वाभाविक रूप से थोड़ा बढ़ जाता है. इस चरण के दौरान कई महिलाओं को सामान्य से ज्यादा गर्मी, थकान या फिर गर्म मौसम में असुविधा महसूस हो सकती है.

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