Dream Science: सपने देखना आंखों का नहीं बल्कि दिमाग का काम है. इस वजह से जो लोग अंधे होते हैं वे भी सपने देखते हैं. हालांकि उन सपनों की प्रकृति काफी हद तक इस बात पर निर्भर होती है कि किसी भी व्यक्ति ने अपनी देखने की क्षमता कब खोई. वैज्ञानिक स्टडी से यह पता चलता है कि जो लोग जन्म से या फिर बचपन से ही अंधे होते हैं उन्हें सपनों का अनुभव उन लोगों से काफी अलग होता है जो बाद में जीवन में अंधे होते हैं. 

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जन्म से अंधे लोगों के सपने 

जो लोग अंधे पैदा होते हैं या फिर चार या पांच साल की उम्र से ही अपनी दृष्टि खो देते हैं उनके पास विजुअल मेमोरीज स्टोर नहीं होती. यही वजह है कि वे छवियों, रंगों या चेहरों के रूप में सपने नहीं देखते. इसके बजाय उनका दिमाग दूसरी इंद्रियों के जरिए इकट्ठा जानकारी का इस्तेमाल करके सपने बनाता है. उनके सपने विजुअल सीन के बजाय ध्वनि, स्पर्श, गंध, स्वाद और भावनाओं से बने होते हैं. 

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ध्वनि और स्पर्श से भरे सपने 

जन्म से अंधे लोगों के लिए सपनों में सुनना सबसे बड़ी भूमिका निभाता है. बातचीत, आवाज, संगीत और रोजमर्रा की आवाज अक्सर उनके सपनों के अनुभव के केंद्र में होती है. स्पर्श भी उनके सपनों का एक जरूरी हिस्सा है. वे चीजों के आकार, अलग-अलग बनावट, तापमान या फिर शारीरिक संवेदनाओं को उसी तरह महसूस कर सकते हैं जैसे अंधे लोग दृश्य छवियों का अनुभव करते हैं.

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गंध, स्वाद और भावनाएं 

सपनों में पसंदीदा भोजन के साथ-साथ फूलों की महक, जानी पहचानी जगह या फिर खाना भी शामिल हो सकता है. खुशी, दर्द, उत्तेजना और चिंता जैसी भावना उतनी ही ज्यादा रहती है जितनी सामान्य दृष्टि वाले लोगों के लिए होती है. डेनिश शोधकर्ता और स्लिप फाउंडेशन द्वारा की गई रिसर्च के मुताबिक जन्म से अंधे लोगों के सपनों में लगभग 86% मामलों में सुनने का अनुभव और लगभग 70% मामलों में छूने का अनुभव शामिल होता है.

बाद में अंधे हुए लोगों के सपने 

जो लोग 5 से 7 साल की उम्र के बाद अपनी आंखों की रोशनी खो देते हैं उनके लिए सपने देखने का अनुभव पूरी तरह बदल जाता है. क्योंकि वे बचपन के दौरान पहले से ही दृश्य यादों को बना चुके होते हैं इस वजह से वे अपने सपनों में लोग, जगह और रंगों को देख सकते हैं.

इसी के साथ शोध से यह भी पता चलता है कि दृष्टिबाधित लोगों को दृष्टिहीन लोगों की तुलना में बूरे सपने आने की संभावना लगभग चार गुना ज्यादा होती है.

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