Astronaut Eyesight: अंतरिक्ष की यात्रा इंसानी शरीर में कुछ ऐसे बदलाव ला सकती है जिनका अनुभव धरती पर करना मुश्किल है. सबसे अहम असर आंखों पर पड़ता है. जो अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहते हैं उनकी नजर में बदलाव आ सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इंसानी शरीर बायोलॉजिकली धरती की ग्रेविटी के हिसाब से ढला होता है. जब ग्रेविटी काफी कम हो जाती है तो शरीर का फ्लूइड सिर की तरफ बढ़ने लगता है. इससे दबाव बनता है और आंखों व ऑप्टिक नर्व पर असर पड़ सकता है. 

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क्या है स्पेस फ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो ऑक्युलर सिंड्रोम?

स्पेस फ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो ऑक्युलर सिंड्रोम उन बदलावों का समूह है जो लंबी अंतरिक्ष यात्रा के दौरान आंखों और देखने की क्षमता पर असर डालते हैं. नासा इससे लंबे वक्त तक चलने वाले मिशन के लिए एक बड़ी मेडिकल परेशानी मानता है क्योंकि अंतरिक्ष यात्रियों की आंखों के गोले की बनावट में बदलाव, ऑप्टिक नर्व के आसपास सूजन और नजर में बदलाव आ सकते हैं. यह स्थिति हर अंतरिक्ष यात्री पर एक जैसा असर नहीं डालती. हालांकि माइक्रो ग्रेविटी में ज्यादा समय बिताने से इनमें से कुछ बदलाव होने की संभावना बढ़ जाती है.

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शरीर का फ्लूइड सिर की तरफ क्यों बढ़ता है?

धरती पर ग्रेविटी लगातार खून और शरीर के दूसरे फ्लूइड को शरीर के निचले हिस्से की तरफ खींचती है. माइक्रो ग्रेविटी में नीचे की तरफ लगने वाला यह बल लगभग खत्म हो जाता है. 

यही वजह है कि लगभग 2 लीटर फ्लूइड पैरों और शरीर के निचले हिस्से से छाती, गर्दन और सिर की तरफ बढ़ सकता है. अंतरिक्ष यात्री यात्रा के शुरुआती दौर में फ्लूइड के इस तरह दोबारा बंटने की वजह से चेहरे को फूला हुआ महसूस करते हैं. वैज्ञानिकों का ऐसा मन है कि शरीर के ऊपरी हिस्से में फ्लूइड की मात्रा बढ़ना उन वजहों में से एक है जिनसे सिर के अंदर दबाव में बदलाव आता है.

आंखों पर कैसे असर पड़ता है? 

दिमाग और रीढ़ की हड्डी सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड से घिरे होते हैं. यह आमतौर पर पूरे नर्वस सिस्टम में घूमता रहता है. माइक्रोग्रेविटी में फ्लूइड की आवाजाही पर ग्रेविटी का सामान्य असर खत्म हो जाता है. वैज्ञानिकों का सामान्य है कि इससे सिर के अंदर दबाव बढ़ सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि ऑप्टिक नर्व आंख को दिमाग से जोड़ती है, इस वजह से दबाव ऑप्टिक नर्व के आस-पास के टिश्यू से होते हुए आंख के गले के पिछले हिस्से तक पहुंच सकता है. इससे आंख के आस-पास दबाव का एक अजीब सा माहौल बन जाता है जो धरती के ग्रेविटी में आमतौर पर नहीं होता.

आंख का गोला चपटा क्यों हो सकता है? 

स्पेस फ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो ऑक्युलर सिंड्रोम से जुड़े सबसे अहम असर में से एक है आंख के गोले के पिछले हिस्से का चपटा होना. जब आंख के पीछे का दबाव बदलता है तो आंख के गोले का आकार भी बदल सकता है. आंख की लंबाई थोड़ी कम हो सकती है जिस वजह से रेटिना पर रोशनी के फोकस होने के तरीके पर असर पड़ता है. 

यही वजह है कि कुछ अंतरिक्ष यात्रियों में दूर की चीज साफ दिखने और पास की चीज साफ न दिखने की समस्या हो सकती है. आंख के आकार में बदलाव के अलावा अंतरिक्ष यात्रियों की ऑप्टिक डिस्क में सूजन और आंख के पिछले हिस्से में टिश्यू में सिलवटें भी आ सकती हैं.

क्या अंतरिक्ष यात्री अंधे हो जाते हैं? 

स्पेस फ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो ऑक्युलर सिंड्रोम का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अंतरिक्ष यात्री अपने आप अपनी नजर खो देते हैं या फिर अंधे हो जाते हैं. इसकी गंभीरता हर व्यक्ति में अलग-अलग होती है. कुछ अंतरिक्ष यात्रियों की देखने की क्षमता में साफ बदलाव महसूस होता है और कुछ में बनावट संबंधी बदलाव दिखते हैं. इनका पता बिना किसी बड़े लक्षण के मेडिकल जांच से चल सकता है. 

कई महीनों या फिर सालों तक चलने वाले मिशन के दौरान यह चिंता और भी ज्यादा बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए मंगल ग्रह के लिए भविष्य के मानव मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों को लो अर्थ आर्बिट की सामान्य यात्रा की तुलना में काफी लंबे समय तक माइक्रो ग्रेविटी का सामना करना पड़ा.

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