Bihar Bengal Division: आरजेडी के प्रधान महासचिव और विधायक रणविजय साहू के एक बयान के बाद राजनीतिक चर्चाएं तेज हो चुकी हैं. रणविजय साहू ने दावा किया है कि बिहार के सीमांचल इलाके को पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों के साथ मिलकर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की तैयारी चल रही है. उनके मुताबिक इस मुद्दे पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बिहार दौरे के दौरान भी चर्चा हो सकती है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या बिहार या फिर पश्चिम बंगाल कानूनी तौर पर अपने इलाके से एक नया राज्य या केंद्र शासित प्रदेश बनाने से रोक सकते हैं या नहीं.

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संसद के पास आखिरी अधिकार 

भारत के संविधान के आर्टिकल 3 के तहत नए राज्य बनाने, सीमाओं को बदलने या मौजूदा राज्यों को फिर से संगठित करने का अधिकार पूरी तरह से भारत की संसद के पास है. राज्य सरकारों के पास ऐसे फैसलों पर वीटो पावर नहीं है. इसका मतलब है कि अगर कोई राज्य सरकार प्रस्ताव का विरोध भी करती है तो भी वह कानूनी तौर पर संसद को राज्य के पुनर्गठन के साथ आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती. 

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नया राज्य बनाने का प्रोसेस कैसे काम करता है? 

यह प्रक्रिया संसद में बिल पेश करने के प्रस्ताव से शुरू होती है. लेकिन आपको बता दें कि ऐसा बिल भारत के राष्ट्रपति की पहले से सिफारिश के बिना पेश नहीं किया जा सकता. राष्ट्रपति के मंजूरी देने के बाद प्रस्ताव को संबंधित राज्य विधानसभाओं, जैसे इस मामले में बिहार और पश्चिम बंगाल को उनकी राय जानने के लिए भेजा जाता है. ये राज्य विधानसभाएं प्रस्ताव पर बहस कर सकती हैं और समर्थन या फिर विरोध जता सकती हैं. लेकिन उनकी राय सिर्फ सलाह देने वाली होती है मानने वाली नहीं. 

 राज्य की राय कानूनी तौर पर मानने वाली नहीं है 

आर्टिकल 3 की सबसे जरूरी बातों में से एक यह है कि पार्लियामेंट राज्य विधानसभाओं की राय मानने के लिए मजबूर नहीं है. अगर कोई राज्य विधानसभा प्रस्ताव का कड़ा विरोध भी करता है तो भी पार्लियामेंट नया राज्य या फिर केंद्र शासित प्रदेश बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकती है.  यह नियम इस बात को पक्का करता है कि एडमिनिस्ट्रेटिव रीऑर्गेनाइजेशन पर राष्ट्रीय स्तर के फैसले क्षेत्रीय राजनीतिक मतभेदों से ना रुकें.

संसद को सिर्फ साधारण बहुमत की जरूरत होती है 

संविधान संशोधनों के उलट जिनके लिए खास बहुमत की जरूरत होती है आर्टिकल 3 के तहत नया राज्य बनाने के लिए पार्लियामेंट में सिर्फ साधारण बहुमत की जरूरत होती है. एक बार जब पार्लियामेंट के दोनों सदन बिल पास करते थे और राष्ट्रपति आखिरी मंजूरी दे देते हैं तो नया राज्य या फिर केंद्र शासित प्रदेश आधिकारिक हो जाता है.

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