दिल्ली के लोग इस वक्त ताजी हवा के मोहताज हैं. उनके राज्य में प्रदूषण की ऐसी मार है कि खुलकर सांस लेना भी दूभर है. सुबहें धुंध और धूल में घिरी रहती हैं. सड़कों पर पानी की बौछार होती हैं, जबकि वैज्ञानिक रसायनों की पतली परत को देख कर बात करते हैं कि आखिर कौन सच में हवा को साफ कर सकता है? क्या सिर्फ पानी ही भरोसेमंद है या रसायन हवा में छिपी धूल को रोकने में बेहतर हैं? रिपोर्टों में खुलासा हुआ है. आइए जानें कि एक्सपर्ट्स ने क्या कहा है.

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बेहद खराब श्रेणी में है दिल्ली की हवा

दिल्ली में बुधवार की सुबह वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 335 पर पहुंच गया और इसे ‘बेहद खराब’ श्रेणी में दर्ज किया गया. यह लगातार दूसरा दिन है जब राजधानी की हवा खतरनाक स्तर तक पहुंची. रविवार और सोमवार को लोगों को थोड़ी राहत मिली थी, लेकिन मंगलवार की रात के बाद धूल और कणों ने फिर शहर को घेर लिया. दिल्ली सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए सड़कों पर पानी का छिड़काव लगातार किया है. औसतन हर दिन लगभग 3,000 किलोमीटर सड़कों पर यह प्रक्रिया होती है. पानी कणों को जमा करता है और धूल को घटाता है. यह तरीका सरल, सस्ता और जल्दी उपलब्ध होने वाला माना जाता है. 

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पानी या केमिकल क्या है ज्यादा सुरक्षित उपाय

लेकिन हाल ही में हुए अध्ययन ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या सिर्फ पानी ही प्रदूषण को खत्म करने के लिए पर्याप्त है या धूल हटाने वाले केमिकल ज्यादा असरदार हैं. एनवायरो पॉलिसी रिसर्च इंडिया (EPRI) और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के संयुक्त अध्ययन में यह सामने आया कि रसायन हवा में मौजूद धूल को पानी से कहीं अधिक समय तक रोक सकते हैं. 

सीपीसीबी के 2018 अध्ययन के अनुसार, रासायनिक धूल निरोधक 50–60% प्रभावी पाए गए, जबकि पानी का असर केवल 25–30% तक रहा. अध्ययन के दौरान केमिकल का इस्तेमाल करने के बाद धूल का स्तर लगभग 30% कम हुआ और यह छह घंटे तक स्थिर रहा. इसके विपरीत, पानी का असर केवल 10–15 मिनट ही दिखा, क्योंकि सतह जल्दी सूख जाती है.

पानी के छिड़काव में कितना है खर्चा

वास्तव में, दिल्ली में पानी का छिड़काव सबसे पुराना और व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला उपाय है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सस्ता उपाय है और आसानी से हर सड़क पर इस्तेमाल किया जा सकता है. 100 वर्ग मीटर क्षेत्र को छह घंटे तक पानी से नियंत्रित करने में लगभग 2160 रुपये का खर्चा आता हैं, जबकि रासायनिक धूल निरोधक की लागत केवल 100 रुपये होती है.

केमिकल का असर

हालांकि, विशेषज्ञ रसायनों के इस्तेमाल पर सतर्कता बरतने की सलाह देते हैं. गलत तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर ये रसायन पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं. सतह पर बनी पतली केमिकल परत धूल को स्थिर करती है, लेकिन हलचल या वायु संचलन के कारण यह टूट जाती है. इसलिए इसे पूरे शहर में इस्तेमाल करना मुश्किल है. वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना था कि केमिकल धूल निरोधक कुछ सीमित क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जाते हैं, जहां हलचल कम होती है. बाकी जगहों पर पानी ही सही है, क्योंकि यह ज्यादा लचीला और सुरक्षित है.

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