Highway Accidents: कॉविड-19 महामारी के बाद पहली बार भारत में राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेस-वे पर होने वाली मौतों में गिरावट देखने को मिली है. लोकसभा में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय राजमार्ग पर होने वाली मौतों में 4.1 प्रतिशत के गिरावट देखने को मिली है. यह 2024 में 64,772 से घटकर 2025 में 62,122 हो गई है. यह सुधार कई सालों से बढ़ती सड़क मौतों के बाद आया है और इसका पूरा श्रय सख्त प्रवर्तन, बेहतर राजमार्ग इंजीनियरिंग और तेज आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया को दिया जा रहा है. 

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 राष्ट्रीय राजमार्ग पर होने वाली मौतों में गिरावट 

2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान यातायात की मात्रा में तेजी से गिरावट देखने को मिली थी. इस वजह से दुर्घटनाएं कम हुई थी. लेकिन जो दुर्घटनाएं हुईं वे अक्सर काफी ज्यादा गंभीर थीं. ऐसा इसलिए ‌क्योंकि खाली सड़कें ओवर स्पीडिंग को बढ़ावा देती थीं. महामारी के बाद जैसे-जैसे यातायात धीरे-धीरे सामान्य होने लगा पूरे भारत में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में वृद्धि जारी रही. 

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हालांकि नए सरकारी आंकड़े एक बड़ा बदलाव दिखाते हैं. महामारी के बाद पहली बार राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेस-वे पर मृत्यु दर में गिरावट देखने को मिली है.

उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा सुधार 

उत्तर प्रदेश ने सबसे ज्यादा सुधार दर्ज किया है. यहां राजमार्ग पर होने वाली मौतों की संख्या 2024 में 9,560 से घटकर 2025 में 7,573 हो गई है. हालांकि राज्य में राष्ट्रीय स्तर पर सड़क दुर्घटना में होने वाली मौत की संख्या सबसे ज्यादा दर्ज की जा रही है. लेकिन यह गिरावट राजमार्ग सुरक्षा में एक बड़े सुधार को दर्शाती है. 

मध्य प्रदेश में भी काफी कमी देखने को मिली है. मृत्यु दर 4,644 से घटकर 3,610 हो गया है. इसी के साथ पंजाब में 1,562 से घटकर 1,022 मौत दर्ज की गई हैं.

दूसरी तरफ तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, आंध्र प्रदेश और गुजरात सहित राज्यों में राजमार्ग दुर्घटनाओं और मृत्यु दर में बढ़ोतरी देखने को मिली है. तमिलनाडु में 71,387 मामलों के साथ देश में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं. लक्षद्वीप 2022 के बाद से शून्य राष्ट्रीय राजमार्ग मृत्यु रिपोर्ट करने वाला एकमात्र केंद्र शासित प्रदेश बना हुआ है.

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सबसे ज्यादा जोखिम किसे?

सरकारी आंकड़ों से यह पता चलता है कि राजमार्ग दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी 25 से 35 साल के लोगों की है. यह आयु समूह काम और व्यक्तिगत वजह से अक्सर यात्रा करता है और ज्यादा तेज रफ्तार से गाड़ी चलाने की ज्यादा संभावना रखता है. इससे वे खास तौर से गंभीर दुर्घटना के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं.

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का ऐसा कहना है की रफ्तार को कम करना, सीट बेल्ट के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना और युवा मोटर चालकों के बीच सुरक्षित ड्राइविंग व्यवहार को बढ़ावा देना मृत्यु दर को और कम करने के लिए जरूरी है. 

राजमार्ग पर होने वाली मौतों में कमी कैसे आ रही है?

मौत में गिरावट को पिछले कुछ सालों में लागू किए गए कई नीतिगत उपायों से जोड़ा जा रहा है. सबसे जरूरी पहलुओं में से एक है ब्लैक स्पॉट की पहचान और सुधार करना. ब्लैक स्पॉट वह जगह होती है जहां पर खराब सड़क डिजाइन या फिर खतरनाक स्थिति की वजह से बार-बार दुर्घटनाएं होती हैं. सरकार ने जंक्शन को फिर से डिजाइन करके, सड़कों को चौड़ा करके, साइनेज में सुधार करके और सुरक्षा बाधाओं को मजबूत करके ऐसे दुर्घटनाग्रस्त हिस्सों को सुधारने के लिए लगभग 40,000 करोड़ के बजट का आवंटन किया है.

इसी के साथ टेक्नोलॉजी ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई है. राष्ट्रीय राजमार्गों की निगरानी अब स्पीड कैमरे, रडार सिस्टम और स्वचालित यातायात प्रवर्तन के जरिए से की जाती है. इससे ड्राइवर के लिए दंड का सामना किए बिना रफ्तार सीमा का उल्लंघन करना मुश्किल हो जाता है.

तेज आपातकालीन देखभाल 

मृत्यु दर में गिरावट का एक दूसरा कारण प्रधानमंत्री राहत पहल के तहत आपातकालीन चिकित्सा प्रतिक्रिया का विस्तार है. यह योजना गोल्डन आवर के दौरान कैशलेस उपचार प्रदान करती है. गोल्डन ऑवर सड़क दुर्घटना के बाद का पहला घंटा होता है. इस दौरान तत्काल चिकित्सा हस्तक्षेप से जीवित रहने की संभावना में काफी सुधार हो सकता है. तेज एंबुलेंस सेवा, तुरंत अस्पताल तक पहुंच और तत्काल आघात देखभाल ने उन मौतों को कम करने में मदद की है जो पहले उपचार में देरी की वजह से होती थी.

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