जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले युवाओं को सुधरने का मौका देने की मांग की गई है. एक सेवानिवृत्त वायु सेना अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि इन बच्चों पर मुकदमा चलाने की बजाय उनसे 7 दिन की सामुदायिक सेवा करवाई जाए.
सुधरने का दिया जाए मौका
याचिकाकर्ता के वकील ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच से मामले पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया. इस पर कोर्ट ने बुधवार, 5 अगस्त को सुनवाई की बात कही. याचिकाकर्ता मनीष कुमार सोलंकी ने कहा है कि प्रदर्शन के दौरान या सोशल मीडिया पर अपशब्दों का इस्तेमाल करने वाले नाबालिगों और पहली बार ऐसी गलती करने वाले युवाओं पर गैरजरूरी सख्ती नहीं होनी चाहिए. उन्हें अपनी गलती सुधारने और समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने का प्रयास होना चाहिए. 7 दिन की सामुदायिक सेवा इसमें मददगार हो सकती है.
युवाओं के भविष्य पर डाल सकते हैं बुरा असर
याचिकाकर्ता की तरफ से वकील सैयद रिजवान अहमद ने कोर्ट से कहा कि ऐसे मामलों में आपराधिक मुकदमे युवाओं के भविष्य पर बुरा असर डाल सकते हैं. जिन लोगों ने हिंसा या तोड़फोड़ नहीं की है, उन पर मुकदमा चलाना सही नहीं होगा. उन्होंने यह अनुरोध भी किया कि इस तरह के मामलों के लिए पूरे देश के लिए एक समान नीति बनाई जाए, ताकि अलग-अलग राज्यों में कार्रवाई के अलग-अलग मानदंड न अपनाए जाएं.
याचिका में 20 जुलाई के छात्र मार्च के आयोजकों की जवाबदेही तय करने की भी मांग की गई है. इसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ लोग अब भी भड़काऊ बयान देकर माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं. हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए.
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