Murasu Cyclone: बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में जब भी कोई चक्रवाती तूफान उठता है, तो उसका एक अनोखा नाम होता है. हाल ही में चर्चा में आए चक्रवात मुरासु ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस तरफ खींचा है. आम जनता के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि इन विनाशकारी तूफानों के इतने दिलचस्प नाम कौन रखता है, क्या यह नाम तुरंत सोचे जाते हैं या सालों पहले तय कर लिए जाते हैं. दरअसल, इन चक्रवातों के नामकरण के पीछे एक बेहद सटीक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली काम करती है, जिसके तहत तूफानों के नाम कई साल पहले ही एक लंबी सूची में फ्रीज कर दिए जाते हैं.
चक्रवातों के नाम कौन तय करता है और कैसे मिलती है जिम्मेदारी?
दुनिया भर के समुद्रों को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटा गया है. भारत और उसके आसपास के उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र, जिसमें बंगाल की खाड़ी और अरब सागर शामिल हैं में आने वाले चक्रवातों के नाम तय करने की जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक आयोग और विश्व मौसम विज्ञान संगठन के एक विशेष पैनल के पास है. इस पैनल को पैनल ऑन ट्रॉपिकल साइक्लोन कहा जाता है.
शुरुआत में इस समूह में भारत, बांग्लादेश, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, श्रीलंका और थाईलैंड समेत 8 देश शामिल थे. साल 2018 में इस पैनल का विस्तार किया गया और इसमें पांच नए देशों- ईरान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और यमन को भी जोड़ा गया. वर्तमान में कुल 13 देश मिलकर इस क्षेत्र के तूफानों के नाम तय करते हैं.
कितने साल पहले तय हो जाते हैं तूफानों के नाम?
तूफानों के नाम अचानक या तुरंत नहीं रखे जाते. यह नाम कई साल पहले ही एडवांस में तय कर लिए जाते हैं. साल 2020 में इस 13 देशों के समूह ने मिलकर भविष्य में आने वाले चक्रवातों के लिए 169 नामों की एक विस्तृत नई सूची जारी की थी. इस सूची को तैयार करने के लिए पैनल में शामिल प्रत्येक देश से 13-13 नाम मांगे गए थे.
इन सभी नामों को वर्णानुक्रम के अनुसार एक टेबल में व्यवस्थित कर दिया गया है. जैसे ही इस क्षेत्र में कोई नया चक्रवात विकसित होता है, सूची में से अगले क्रम का नाम उसे दे दिया जाता है. इस सूची में इतने नाम एडवांस में मौजूद होते हैं कि आने वाले कई सालों तक नए नामों को सोचने की जरूरत नहीं पड़ती. चक्रवात मुरासु का नाम भी इसी पहले से तय सूची का हिस्सा है, जिसे नियमों के अनुसार इस बार इस्तेमाल किया गया है.
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नाम रखने के कड़े नियम और मुरासु का मतलब
तूफानों के नाम तय करने के लिए मौसम विज्ञान विभागों ने बेहद सख्त नियम बनाए हैं. पैनल का कोई भी सदस्य देश ऐसा नाम नहीं दे सकता जो राजनीतिक, धार्मिक या सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील हो. नाम ऐसा होना चाहिए जिससे किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस न पहुंचे. इसके अलावा, नाम का उच्चारण बेहद आसान होना चाहिए और उसमें अधिकतम 8 अक्षर ही हो सकते हैं. एक बार इस्तेमाल हो चुके नाम को दोबारा कभी भी किसी नए चक्रवात के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता.
तमिल संस्कृति में मुरासु एक पारंपरिक वाद्य यंत्र यानी ढोल को कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल प्राचीन काल में घोषणाएं करने या युद्ध की शुरुआत के समय संदेश देने के लिए किया जाता था. चूंकि यह नाम कड़े मानकों को पूरा करता था, इसलिए इसे सालों पहले ही सूची में शामिल कर लिया गया था और अब अपनी बारी आने पर इसे इस चक्रवात को दे दिया गया.
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