Cyclone Murasu: समुद्र के सीने पर उठने वाले चक्रवाती तूफान हमेशा से ही इंसानी बस्तियों के लिए भारी तबाही का संदेश लेकर आते हैं. हाल ही में आए अर्नब तूफान के बाद अब बंगाल की खाड़ी में मुरासु नाम के एक और खतरनाक चक्रवात ने दस्तक दे दी है, जो तेजी से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ रहा है. मौसम विभाग की चेतावनियों के बीच यह सवाल आम लोगों के मन में जरूर आता है कि आखिर इन भयंकर तूफानों की रफ्तार और उनके सटीक रास्ते का अनुमान इतनी बारीकी से कैसे लगाया जाता है. आइए समझते हैं.
मुरासु तूफान कब होगा खतरनाक?
मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, खतरनाक रूप ले चुका चक्रवात मुरासु आज रात से लेकर कल सुबह के बीच दक्षिणी आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों से टकरा सकता है. इसका मुख्य लैंडफॉल ओंगोल के पास नेल्लोर और नरसापुर के बीच होने की पूरी आशंका जताई जा रही है. इस दौरान तटीय क्षेत्रों में हवा की गति 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है, जिससे भारी नुकसान की आशंका को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह से सतर्क हो गया है.
अंतरिक्ष से सैटेलाइट के जरिए शुरुआती निगरानी
किसी भी चक्रवात की सबसे पहली आहट अंतरिक्ष में मौजूद कैमरों और सेंसर की पकड़ में आती है. भारत के पास INSAT-3D और INSAT-3DR जैसे अत्याधुनिक मौसम उपग्रह मौजूद हैं, जो तूफान के जन्म लेते ही सक्रिय हो जाते हैं. जब चक्रवात समुद्र के गहरे पानी में अपनी शुरुआती अवस्था में होता है, तब यही सैटेलाइट लगातार बादलों की लाइव तस्वीरें भेजते हैं. वैज्ञानिकों को इन्हीं तस्वीरों से संकेत मिलता है कि बादलों का कौन सा चक्रवाती घेरा कहां घूम रहा है और कितनी तेजी से बड़ा आकार ले रहा है.
यह भी पढ़ें: India Protest History: भारत के 5 सबसे बड़े जन आंदोलन कौन से, क्या रहा था उनका रिजल्ट
ड्वोरेक तकनीक से तूफान की तीव्रता का आकलन
चूंकि खुले समुद्र के बीचोंबीच हवा की गति को नापने के लिए कोई भौतिक मशीनें नहीं लगाई जा सकतीं, इसलिए बादलों के पैटर्न का अध्ययन किया जाता है. इसके लिए विशेष रूप से 'ड्वोरेक तकनीक' का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर विकसित किया गया था. इसमें तूफान के बादलों को मुड़ी हुई पट्टियों, शीयर, घने बादलों और आंख जैसी चार श्रेणियों में बांटा जाता है. हर पैटर्न को एक विशिष्ट T-नंबर दिया जाता है, और यह नंबर जितना ज्यादा बड़ा होता है, तूफान उतना ही अधिक ताकतवर माना जाता है.
डॉप्लर रडार की भूमिका और तटीय ट्रैकिंग
जैसे-जैसे कोई चक्रवात समुद्र से आगे बढ़कर जमीन यानी तट के करीब पहुंचता है, वैसे-वैसे जमीन पर स्थापित डॉप्लर वेदर रडार अपनी मुख्य भूमिका निभाना शुरू कर देते हैं. इन शक्तिशाली रडार की मदद से वैज्ञानिक चक्रवात की रेडियल वेलोसिटी, बादलों के घनत्व और होने वाली बारिश की सही मात्रा को मॉनिटर करते हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत का सबसे पहला चक्रवात पहचान रडार साल 1970 में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में ही स्थापित किया गया था, जिसने देश में मौसम विज्ञान की दिशा बदल दी थी.
सुपरकंप्यूटर और मौसम के मॉडल से तय होता रास्ता
तूफान किस दिशा में जाएगा और कहां टकराएगा, इसका सटीक पूर्वानुमान लगाने के लिए संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडल का उपयोग किया जाता है. वायुमंडल और समुद्र के बदलते तापमान के आंकड़ों को कंप्यूटर में डालकर भौतिकी के जटिल समीकरण हल किए जाते हैं. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पास मिहिर और प्रत्यूष जैसे बेहद शक्तिशाली हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम मौजूद हैं, जिन पर ये मॉडल चलते हैं. इन आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से आज तूफानों के रास्ते का अनुमान लगाने की सटीकता में 20 से 25 प्रतिशत तक का सुधार दर्ज किया गया है.
यह भी पढ़ें: Science Behind Ghosts: सुनसान जगहों पर क्यों होता है भूत का अहसास, क्या है इसका साइंस?
