दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए सुरंग खोदने वाली सुपर मशीनों के निर्यात पर कड़े नियम लागू किए हैं. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने राष्ट्रिय सुरक्षा और अपनी अत्याधुनिक तकनीकी गोपनीयता का हवाला देते हुए टनल बोरिंग मशीन के विदेशी ऑर्डर्स पर नियंत्रण लगाए हैं.

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चीन के इस कदम के बाद दुनिया भर के बड़े कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स, मेट्रो निर्माण और सामरिक सुरंग परियोजनाओं में खलबली मच गई है. ऐसे में आज हर कोई यह जानना चाहता है कि चीन के अलावा दुनिया में कौन-कौन से देश इन सुरंग खोदने वाली मशीन को बेचते हैं.

यह मशीनें बेचने वाले प्रमुख देश

सुरंग खोदने वाली मशीन को बनाना कोई आसान काम नहीं है, इसलिए दुनिया के गिने-चुने देश ही इसका निर्माण और निर्यात करते हैं. इस बाजार में सबसे बड़ा नाम जर्मनी का है. इसके अलावा अमेरिका, जापान, चीन, कनाडा और फ्रांस जैसे देश इस भारी-भरकम मशीन के प्रमुख उत्पादक और निर्यातक हैं. ये देश पूरी दुनिया में इन मशीनों की सप्लाई करते हैं. भारत भी अपनी मेट्रो और पहाड़ी रास्तों में सुरंग बनाने के लिए मुख्य रूप से इन्हीं देशों से मशीनें आयात करता है.

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किस देश की मशीन है सबसे अच्छी?

अगर तकनीक, मजबूती और सुरक्षा के लिहाज से देखा जाए, तो जर्मनी की सुरंग खोदने वाली मशीनें दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाती हैं. जर्मनी की हेरेनकनेक्ट कंपनी इस क्षेत्र में ग्लोबल लीडर है और इसके द्वारा बनाई गई मशीनें सबसे कठिन और पथरीली चट्ठानों को भी आसानी से काटने में सक्षम होती हैं. जर्मनी के बाद जापान की मशीनरी जैसे कोमात्सु और मित्सुबिशी को अपनी बेहतरीन इलेक्ट्रोनिक्स और शहरी इलाकों में बिना कंपन के सुरंग खोदने की सूक्ष्म तकनीक के लिए सबसे बेस्ट माना जाता है. 

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चीन के कड़े नियंत्रण का बाजार पर होने वाला असर

चीन के इस नियंत्रण के बाद निश्चित रूप से टनल बोरिंग मशीनों की कीमतों में भारी उछाल आने की संभावना है. भारत सहित कई विकासशील देश जो सस्ते चीनी विकल्पों पर निर्भर थे, उन्हें अब दोबारा जर्मनी, जापान और अमेरिका जैसे देशों का रुख करना पड़ेगा.

हालांकि पश्चिमी देशों की मशीनें चीनी मशीनों की तुलना में काफी महंगी होती हैं, लेकिन गुणवत्ता और लाइफ-स्पैन के मामले में वे कहीं अधिक विश्वसनीय होती हैं. इस पाबंदी के बाद अब वैश्विक कंपनियों को अपने चल रहे प्रोजेक्ट्स के लिए नए टेंडर जारी करने होंगे, जिससे कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार कुछ समय के लिए धीमी पड़ सकती है.

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