Abrahamic Religions: दुनिया भर में आज मुस्लिम बकरीद मना रहे हैं. इसी बीच आपको बता दें कि इस्लाम, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म को सामूहिक रूप से इब्राहीमी धर्म के नाम से जाना जाता है. क्योंकि इन तीनों की आध्यात्मिक जड़ पैगंबर इब्राहिम से जुड़ी हैं. मान्यताओं, रीति रिवाज और ऐतिहासिक विकास में अंतर होने के बावजूद भी ये धर्म कई बुनियादी अवधारणा, नैतिक शिक्षा, पैगंबरों और आध्यात्मिक परंपराओं को साझा करते हैं.
एक ही ईश्वर में विश्वास
इस्लाम, यहूदी धर्म और ईसाई धर्म के बीच सबसे मजबूत साझा कड़ियों में से एक है एकेश्वरवाद. यानी एक ही सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास. यह तीनों धर्म सिखाते हैं कि ईश्वर ही इस ब्रह्मांड का रचयिता है और मानवता पर उसका ही सबसे बड़ा अधिकार है. इन परंपराओं के अंदर मूर्तियों की पूजा करना या फिर ईश्वर के साथ किसी दूसरे को साझेदारी बनाना वर्जित है.
पैगंबर इब्राहिम का आदर
तीनों धर्मों में पैगंबर इब्राहिम का व्यक्तित्व काफी ज्यादा महत्व रखता है. इसी साझा आदर भाव की वजह से इन धर्मों को इब्राहीमी धर्म कहा जाता है. तीनों ही परंपराओं में इब्राहिम को ईश्वर के प्रति आस्था, आज्ञाकारिता और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. हालांकि उनकी ऐतिहासिक वंशावली बाद में अलग-अलग हो जाती हैं. यहूदी धर्म और ईसाई धर्म अपनी जड़ों को इब्राहिम के पुत्र इसहाक और पौत्र याकूब से जोड़ते हैं और इस्लाम अपनी वंशावली को इब्राहिम के बड़े पुत्र इस्माइल से जोड़ता है.
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पवित्र ग्रंथों का महत्व
हर धर्म पवित्र ग्रंथों के जरिए से हुए ईश्वरीय प्रकाशन में विश्वास रखता है. यहूदी धर्म में तोराह ही मूल आधार ग्रंथ है. ईसाई धर्म में बाइबल का अनुसरण किया जाता है और इस्लाम में कुरान को अंतिम ईश्वरीय प्रकाशन के रूप में मान्यता दी गई है.
देवदूत और पैगंबर में साझा विश्वास
तीनों धर्म देवदूत के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं. ये ईश्वर के संदेशवाहक या फिर सेवक के रूप में काम करते हैं. गैब्रियल और माइकल जैसे देवदूत इन परंपराओं में साफ नजर आते हैं. इसी तरह नूह, मूसा, दाऊद और इब्राहिम जैसे पैगंबरों का भी तीनों धर्मों में गहरा आदर किया जाता है. ईसाई लोग ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र मानते हैं और इस्लाम उन्हें सबसे महान पैगंबरों में से एक के रूप में सम्मानित करता है और उन्हें अल मसीह कहकर संबोधित करता है.
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