Bakrid 2026: भारत और दुनिया भर के मुस्लिम आज ईद-उल-अजहा का त्योहार मना रहे हैं. इसे बकरीद भी कहा जाता है. मस्जिद और ईदगाह में खास ईद की नमाज अदा करने के बाद आर्थिक रूप से सक्षम मुस्लिम बकरे और भीड़ जैसे जानवरों की कुर्बानी देते हैं. इसके बाद उनके मांस को रिश्तेदारों और जरूरतमंदों में बांटा जाता है. इन रस्मों के बीच लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या कुर्बानी और अकीका दोनों एक ही जानवर से किए जा सकते हैं? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
बड़े जानवरों का इस्तेमाल
इस्लामी कानून के मुताबिक खास तौर से हनफी विचारधारा के तहत भैंस या ऊंट जैसे बड़े जानवर को सात हिस्सों में बांटा जा सकता है. ऐसे मामलों में कोई व्यक्ति कुछ हिस्से कुर्बानी के लिए और बाकी हिस्से अकीका के लिए तय कर सकता है. इसका मतलब है कि दोनों रस्में एक ही बड़े जानवर के जरिए एक साथ की जा सकती हैं.
छोटे जानवरों का इस्तेमाल
बकरे या फिर भेड़ जैसे छोटे जानवरों के मामले में नियम बदल जाते हैं. इस्लामी कानून में बकरे में सिर्फ एक हिस्सा होता है. क्योंकि इस एक हिस्से को कुर्बानी और अकीका दोनों की नियत में नहीं बांटा जा सकता इस वजह से मुसलमान एक ही बकरे में कुर्बानी और अकीका दोनों एक साथ नहीं कर सकते.
कुर्बानी और अकीका के धार्मिक उद्देश्य
हालांकि दोनों रस्मों में जानवरों की कुर्बानी शामिल होती है लेकिन उसके बावजूद भी उनके मतलब और उद्देश्य पूरी तरह से अलग हैं. कुर्बानी पैगंबर इब्राहिम (AS) के बलिदान की याद में की जाती है और यह अल्लाह के हुक्म के आगे सिर झुकाने का प्रतीक है. दूसरी तरफ अकीका बच्चे के जन्म के बाद अल्लाह का शुक्रिया अदा करने के तौर पर किया जाता है. इसे नवजात शिशु की सुरक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य के लिए एक उत्सव और प्रार्थना माना जाता है.
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दोनों रस्मों का अलग-अलग समय
कुर्बानी सिर्फ ईद-उल-अजहा की खास दिन जुल्हिज्जा महीने की 10वीं, 11वीं और 12वीं तारीख को ही की जा सकती है. वहीं अकीका कैलेंडर तारीख से नहीं बल्कि बच्चों के जन्म से जुड़ा है. इबे बच्चे के जन्म के 7वें, 14वें या फिर 21वें दिन करना सुन्नत माना जाता है.
जानवरों की संख्या में अंतर
कुर्बानी के लिए एक व्यक्ति के लिए एक बकरा या फिर किसी बड़े जानवर में एक हिस्सा काफी होता है. अकीका के लिए इस्लामी परंपरा के मुताबिक लड़के के जन्म पर दो बकरे या फिर दो हिस्से और लड़की के जन्म पर एक बकरा या फिर एक हिस्सा देने की सुन्नत है.
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