बांग्लादेश में उस्मान हादी की मौत के विरोध में चल रहे प्रदर्शन के दौरान एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की जान ले ली गई, जिसके बाद उसके शव को आग के हवाले कर दिया गया. इसके अलावा भी बांग्लादेश में हिंदुओं पर जमकर अत्याचार हो रहा है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत केवल चिंता जताने तक सीमित रहेगा या फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कोई ठोस कदम उठाएगा?

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बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति पर बढ़ती चिंताएं

हाल के वर्षों में बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. विभिन्न मानवाधिकार संगठनों और मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि कुछ इलाकों में धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया गया और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया है. हालांकि बांग्लादेश सरकार इन घटनाओं को कानून-व्यवस्था से जुड़ी अलग-अलग घटनाएं बताती रही है, लेकिन समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

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भारत की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक रुख

भारत सरकार ने कई मौकों पर बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया है. विदेश मंत्रालय के स्तर पर यह स्पष्ट किया गया है कि भारत अपने पड़ोसी देशों में रहने वाले हिंदुओं समेत सभी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सुरक्षा को लेकर संवेदनशील है. भारत ने बांग्लादेश सरकार से अपेक्षा जताई है कि वह दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे और धार्मिक सौहार्द बनाए रखे.

क्या भारत सीधे दखल दे सकता है?

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप करना आसान नहीं होता है. भारत भी इस सिद्धांत का सम्मान करता है. ऐसे में भारत के पास सीधे सैन्य या प्रशासनिक दखल का विकल्प नहीं है, लेकिन कूटनीतिक दबाव, द्विपक्षीय बातचीत और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मुद्दा उठाना ऐसे रास्ते हैं, जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है.

अंतरराष्ट्रीय मंच और मानवाधिकार का पहलू

संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अल्पसंख्यक अधिकार एक अहम विषय रहा है. यदि किसी देश में धार्मिक उत्पीड़न की आशंका बढ़ती है, तो वैश्विक समुदाय की नजरें उस पर टिक जाती हैं. भारत, एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते, मानवाधिकारों के मुद्दे पर अपनी बात अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रख सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया संतुलन और कूटनीतिक समझ के साथ आगे बढ़ाई जाती है.

बांग्लादेश सरकार का पक्ष

बांग्लादेश की सरकार बार-बार यह कहती आई है कि उसका संविधान धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है और सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं. सरकार का दावा है कि जिन घटनाओं की बात की जाती है, वे योजनाबद्ध धार्मिक अत्याचार नहीं बल्कि स्थानीय स्तर पर उपजे विवाद हैं. साथ ही यह भी कहा जाता है कि दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है.

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