Afghanistan Weapons Sources: अफगानिस्तान के काबुल में पाकिस्तान द्वारा कथित हवाई हमले के बाद इस क्षेत्र में तनाव एक बार फिर से बढ़ चुका है. इससे सुरक्षा और स्थिरता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं. इस घटना के बाद एक अहम सवाल सामने आया है. अफगानिस्तान को अपने हथियार आखिर कहां से मिलते हैं और क्या अफगानिस्तान की यह सैन्य क्षमता पाकिस्तान के लिए एक चुनौती बन सकती है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
अमेरिका और नाटो के उपकरण
अफगानिस्तान की मौजूदा सैन्य ताकत का सबसे बड़ा हिस्सा उन हथियारों से आता है जिन्हें अमेरिका और नाटो सेनाएं 2021 में अपनी वापसी के बाद पीछे छोड़ गई थी. जब तालिबान ने सत्ता संभाली तो उसने लगभग 7.1 अरब डालर मूल्य के सैन्य उपकरणों पर कब्जा कर लिया. इनमें m4 और m16 राइफल, हम्बी जैसे बख्तरबंद वाहन, नाइट विजन डिवाइस और थर्मल ऑप्टिक्स, हेलीकॉप्टर और विमान शामिल थे.
सोवियत युग के हथियार अभी भी इस्तेमाल में
अफगानिस्तान के पास सोवियत संघ के दौर के पुराने हथियारों का भी एक बड़ा भंडार मौजूद है. इनमें AK-47 राइफलें, टैंक और तोपखाने प्रणालियां शामिल हैं. यह हथियार 1980 के दशक से ही अफगानिस्तान के सैन्य परिदृश्य का हिस्सा रहे हैं.
क्षेत्रीय और अनौपचारिक तरीकों से हथियार
रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन, तुर्की और यहां तक की खुद पाकिस्तान जैसे देशों में बने हथियार भी तालिबान के कब्जे में पाए गए हैं. हालांकि इनकी आपूर्ति अधिकारी तौर पर नहीं की जाती है. ऐसा माना जाता है कि इनमें से ज्यादातर हथियार काला बाजार नेटवर्क, तस्करी के रास्ते, पहले के संघर्षों से बचे हुए हथियार के जरिए अफगानिस्तान में पहुंचे हैं.
पाकिस्तान के लिए यह महंगा क्यों पड़ सकता है?
कहा जा रहा है कि अफगानिस्तान की मौजूदा सैन्य क्षमता पाकिस्तान के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती हैं. इसकी मुख्य वजह अमेरिका के आधुनिक उपकरणों की मौजूदगी है. नाइट विजन और थर्मल डिवाइस जैसे उपकरण रात के समय होने वाले ऑपरेशंस में काफी बढ़त दिला सकते हैं.
बीते कुछ महीनों में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा पर झड़पें तेज हो गई हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक सीमा पर हुई इन झड़पों में दोनों ही पक्षों को भारी जान माल का नुकसान हुआ है. पाकिस्तान में तालिबान पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान को समर्थन देने का भी आरोप लगाया है.
तालिबान की ताकत सिर्फ उसके हथियारों में नहीं है बल्कि उसके अनुभव में भी है. दशकों तक गोरिल्ला युद्ध लड़ने के अनुभव के चलते उसके लड़ाके ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी इलाकों में लड़ने में काफी माहिर हैं.
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