Indian Ships Registration: पहली नजर में भारतीय नाम वाले जहाजों को देखकर ऐसा लग सकता है कि भारत के पास काफी बड़ा ग्लोबल जहाजों का बेड़ा है. लेकिन असल में इनमें से कई जहाज भारत में रजिस्टर्ड ही नहीं हैं. इसके बजाय वे विदेशी झंडों के तहत काम करते हैं. अब भले ही उनमें भारतीय क्रूर सदस्य हों या फिर उनका भारत से कोई जुड़ाव हो. यह उलझन भरी स्थिति ग्लोबल शिपिंग के तरीकों, विदेश में मिलने वाले लागत फायदे और भारत के अपने रेगुलेटरी ढांचों की वजह से है.
फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस
इस चलन के पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक है फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस. इंटरनेशनल समुद्री कानून के तहत हर जहाज को किसी न किसी देश में रजिस्टर्ड होना जरूरी है. लेकिन यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि वह उसी देश में रजिस्टर्ड हो जहां जहाज का मालिक रहता है. शिपिंग कंपनियां अक्सर पनामा, लाइबेरिया और मार्शल आइलैंड जैसे देशों को चुनती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि वे कम टैक्स, कम कागजी कार्रवाई और फ्लैक्सिबल नियम कानून की सुविधा देते हैं. इन फायदों से जहाजों को चलाने की लागत में काफी कमी आती है.
विदेशों में कम लागत
इन फ्लैग्स ऑफ कन्वीनियंस देशों में जहाज रजिस्टर्ड करवाने से कंपनियां कई तरीकों से पैसे बचा सकती हैं. सख्त समुद्री कानून वाले देशों की तुलना में यहां के नियम-कानून का पालन करना भी ज्यादा आसान होता है.
भारत में टैक्स का भारी बोझ
भारत में जहाज रजिस्टर्ड करवाना काफी महंगा पड़ सकता है. भारतीय झंडे के तहत काम करने वाली शिपिंग कंपनियों को अक्सर ज्यादा टैक्स और ज्यादा आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ता है. जैसे विदेशी शिपिंग कंपनियों को भारतीय झंडे वाले जहाज से होने वाली कमाई पर लगभग 7.5% टैक्स देना पड़ सकता है. इसके अलावा जहाज के रखरखाव और मरम्मत से जुड़े खर्च भी होते हैं. इन सेवाओं पर लगने वाला जीएसटी भी शामिल होता है.
सख्त नियम कानून और पालन के नियम
भारत के समुद्री कानून नियमों के सख्त पालन की शर्तें लागू करते हैं. कंपनियों को सुरक्षा, क्रू सदस्यों की भलाई और जहाज के संचालन से जुड़े नियमों का पालन करना जरूरी होता है. इसके अलावा जहाज के मालिकाना हक से जुड़ी कुछ शर्ते भी होती हैं. जहाज के मालिक या फिर कंपनी का भारत में रजिस्टर्ड होना जरूरी है.
फाइनेंसिंग से जुड़ी चुनौतियां
एक और बड़ी बाधा फाइनेंसिंग की लागत है. जहाजों को खरीदने और उन्हें चलाने के लिए काफी बड़े निवेश की जरूरत होती है. भारत में जहाज खरीदने के लिए मिलने वाले लोन अक्सर महंगे होते हैं और उनके साथ कड़ी शर्तें भी जुड़ी होती हैं. इस वजह से कंपनियों के लिए भारतीय झंडे के तहत अपने जहाज के बेड़े का विस्तार करना काफी मुश्किल हो जाता है.
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