कई बार कुछ फिल्में ऐसी आती हैं जो सिर्फ मनोरंजन नहीं देतीं बल्कि हमें इतिहास, समाज, सेना, कठिन परिस्थितियों या किसी बड़े सामाजिक संदेश से जुड़ती हैं. ऐसी फिल्मों को ज्यादा से ज्यादा लोग देख सकें, इसके लिए राज्य सरकारें कई बार उन्हें टैक्स फ्री (Tax-Free) घोषित कर देती हैं.

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हाल ही में अभिनेता फरहान अख्तर की फिल्म 120 बहादुर, जो 1962 के चीन–भारत युद्ध में रेजांग ला की ऐतिहासिक लड़ाई पर आधारित है, काफी ज्यादा सुर्खियों में है. दिल्ली सरकार ने इस फिल्म को टैक्स-फ्री कर दिया है, ताकि ज्यादा लोग इसे सस्ते टिकट में देख सकें और सेना के शौर्य से रूबरू हो सकें. हालांकि, एक सवाल यह भी है कि किसी फिल्म को टैक्स-फ्री करने का अधिकार किसके पास होता है और इसके बाद क्या टिकट बिल्कुल फ्री हो जाते हैं?

फिल्म को टैक्स-फ्री घोषित करने का फैसला कौन लेता है?

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फिल्म को टैक्स-फ्री करने का अधिकार सिर्फ राज्य सरकारों के पास होता है. देश की हर राज्य सरकार अपने राज्य के थिएटरों में चल रही किसी भी फिल्म से मनोरंजन कर हटाने का फैसला ले सकती है. किस फिल्म को टैक्स-फ्री किया जाए, इसके लिए भारत में तय कानून या मानक नहीं है. यह पूरी तरह राज्य सरकार के विचार, निर्णय और फिल्म की विषय-वस्तु पर निर्भर करता है. अक्सर ऐसी फिल्मों को टैक्स-फ्री घोषित किया जाता है, जो समाज को अच्छा संदेश देती हैं. प्रेरक होने के साथ-साथ इतिहास, राष्ट्रभक्ति या सामाजिक मुद्दों पर आधारित होती हैं. इसके अलावा देश के लिए योगदान देने वाले व्यक्तियों की कहानी बताती हैं और सामाजिक जागरूकता बढ़ाती हैं.

टैक्स-फ्री करने से सरकार की कमाई कितनी घटती है?

स्टेट गवर्नमेंट्स मनोरंजन कर (Entertainment Tax / GST Share) को छोड़ देती हैं. इससे सरकार की कमाई में कमी होती है, लेकिन यह नुकसान बहुत बड़ा नहीं होता. सरकार इसे सामाजिक फायदे के रूप में देखती है और ऐसे कदम को सार्वजनिक हित माना जाता है.  राज्य सरकारें टैक्स-फ्री इसलिए करती हैं ताकि ऐसी फिल्में ज्यादा से ज्यादा लोग देखें. समाज में संदेश तेजी से फैल सके. किसी जरूरी घटना या मुद्दे के प्रति जागरूकता बढ़े, राज्य की पॉजिटिव पिक्चर बने और कुछ मामलों में पर्यटन या किसी क्षेत्र को बढ़ावा मिले. ट्रेड एनालिस्ट भी मानते हैं कि यह सरकार की सोच और उस विषय की प्रासंगिकता पर निर्भर करता है. 

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