पिछले कई वर्षों से एमबीए को बेहतर करियर, मोटी सैलरी और लीडरशिप रोल की गारंटी माना जाता रहा है. लेकिन अब बढ़ती पढ़ाई के खर्च, नौकरी के मार्केट में अनिश्चितता और रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट को लेकर छात्रों की बढ़ी सतर्कता के चलते एमबीए और एमबीबीएस जैसी पॉपुलर डिग्रियों के क्रेज पर असर पड़ता दिख रहा है. ग्रेजुएट मैनेजमेंट एडमिशन काउंसिल की ओर से जारी एप्लीकेशन ट्रेंड्स सर्वे 2026 की रिपोर्ट के अनुसार लगातार 2 वर्षों की बढ़ोतरी के बाद 2026 में वैश्विक स्तर पर एमबीए कार्यक्रमों के लिए आवेदनों में 13 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर के लगभग दो-तिहाई बिजनेस स्कूलों ने एमबीए आवेदनों में कमी की बात एक्सेप्ट की है, जो पिछले 1 दशक में आई सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है. 

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लगातार 2 वर्षों की बढ़त के बदला रुख 

यह गिरावट पिछले दो एडमिशन चक्र के मुकाबले एक बड़ा बदलाव दिख रही है. वैश्विक एमबीए आवेदनों में 2024 में 13 प्रतिशत और 2025 में 2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी. लेकिन 2026 में ट्रेंड पूरी तरह बदल गया है. यह मंदी केवल एक स्पेशल फॉर्मेट तक सीमित नहीं रही, बल्कि सभी प्रकार के एमबीए कोर्सेज में गिरावट देखी गई है. इसमें फुल टाइम 2 वर्षीय एमबीए में 13 प्रतिशत की गिरावट, 1 वर्षीय एमबीए कोर्स में 11 प्रतिशत की गिरावट, एग्जीक्यूटिव एमबीए में 18 प्रतिशत की गिरावट, फ्लेक्सिबल एमबीए 23 प्रतिशत की गिरावट, ऑनलाइन एमबीए में 9 प्रतिशत की गिरावट और पार्ट टाइम एमबीए में 15 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. इन आंकड़ों से साफ है कि छात्र केवल पारंपरिक क्लासरूम छोड़कर ऑनलाइन शिक्षा की तरफ ही नहीं बढ़ रहे, बल्कि एमबीए को लेकर उनकी सोच बदल रही है. 

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इंटरनेशनल आवेदनों में भारी कमी 

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2026 में वैश्विक स्तर पर कुल एमबीए आवेदनों में अंतरराष्ट्रीय उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत रही. फुल टाइम 2 वर्षीय एमबीए प्रोग्राम के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आवेदनों में 28 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई. जबकि घरेलू आवेदनों में केवल 11 प्रतिशत की कमी आई. जानकारों के अनुसार बदलती वीजा नीतियां, सख्त आवेदन नियम, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और नौकरी के बाजार में मंदी इसके मुख्य कारण है.

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भारतीय छात्रों का एमबीए के लिए नया ठिकाना 

जीमैक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय छात्रों की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है. अब भारतीय उम्मीदवार अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के बजाय यूरोप और एशिया के बिजनेस स्कूलों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. यूरोप में यूके को छोड़कर 50 प्रतिशत से ज्यादा बिजनेस स्कूलों ने भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय टैलेंट का सबसे बड़ा सोर्स बताया है. वहीं पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में 39 प्रोग्राम ने माना कि भारत उनके यहां अंतरराष्ट्रीय छात्रों का टॉप सोर्स है. वहीं दूसरी ओर अमेरिका के 41 प्रतिशत बिजनेस स्कूलों ने एक्सेप्ट किया कि उन्हें भारतीय उम्मीदवारों के आवेदनों में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली है. यूके में भी वर्क वीजा और स्टूडेंट वीजा आवेदनों में 43 प्रतिशत और 19 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. 

छंटनी और मंदी है इस बदलाव का बड़ा कारण 

ग्रेजुएट मैनेजमेंट एजुकेशन कैटेगरी के 37 प्रतिशत संस्थाओं का मानना है कि छंटनी, मंदी और जॉब मार्केट के उतार चढ़ाव जैसे आर्थिक कारणों ने छात्रों के फैसलों को प्रभावित किया है. एमबीए करने के लिए न केवल मोटी ट्यूशन फीस देनी पड़ती है, बल्कि मौजूदा नौकरी छोड़कर 1 से 2 साल का समय और एजुकेशन लोन का खतरा भी उठाना पड़ता है. हालांकि ज्यादा सिलेक्टिव बिजनेस स्कूलों में आवेदनों में केवल 9 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि ओपन एडमिशन वाले नॉर्मल कॉलेज में यह गिरावट 21 प्रतिशत रही है.

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