Digital Payment Future India: भारत में डिजिटल भुगतान की रफ्तार बीते कुछ सालों में काफी तेज हुई है. आज हालात यह हैं कि चाय की दुकान, ऑटो का किराया, बिजली का बिल या मोबाइल रिचार्ज से लेकर महंगी शॉपिंग तक हर जगह यूपीआई का इस्तेमाल आम हो गया है. क्यूआर कोड अब सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि कैश से आजादी का जरिया बन चुका है.

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लेकिन बजट 2026 से पहले यूपीआई को लेकर एक ऐसी हकीकत सामने आ रही है, जिस पर अब चर्चा शुरू हो गई है. यह मुद्दा फ्री डिजिटल पेमेंट मॉडल के भविष्य से जुड़ा है. आने वाले समय में सरकार के फैसले का असर आम लोगों को प्रभावित कर सकता हैं.

यूपीआई की पकड़ मजबूत, लेकिन व्यापारी नेटवर्क अब भी सीमित

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देश में डिजिटल पेमेंट का बड़ा हिस्सा अब यूपीआई पर टिका हुआ है. कुल डिजिटल लेनदेन का लगभग 85 फीसदी हिस्सा यूपीआई के माध्यम से किया जा रहा है. आंकड़ों की बात करें तो, अक्टूबर महीने में ही 20 अरब से ज्यादा ट्रांजैक्शन हुए और करीब 27 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन दर्ज किया गया. ये आंकड़े बताते हैं कि यूपीआई कितनी तेजी से लोगों की रोजमर्रा का हिस्सा बन चुका है.

हालांकि, इन मजबूत आंकड़ों के बीच एक चुनौती भी सामने आती है. डेटा के मुताबिक, केवल करीब 45 फीसदी व्यापारी ही नियमित रूप से यूपीआई पेमेंट स्वीकार कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि देश के लगभग एक-तिहाई पिनकोड ऐसे हैं, जहां 100 से भी कम एक्टिव UPI मर्चेंट मौजूद हैं. जबकि इन इलाकों में व्यापारियों की संख्या की संभावना ज्यादा है.

फ्री यूपीआई मॉडल पर बढ़ता आर्थिक दबाव

द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपीआई की सबसे बड़ी चुनौती इसका पूरी तरह मुफ्त होना है. अभी तक दुकानदारों से किसी तरह का कोई MDR नहीं लिया जाता है. ताकि छोटे व्यापारियों को सहूलियत मिल सके. लेकिन हर यूपीआई लेनदेन को पूरा करने में करीब 2 रुपये का खर्च आता है. जिसे बैंक और फिनटेक कंपनियां वहन करती हैं.

सरकार ने 2023-24 में  डिजिटल पेमेंट को सपोर्ट करने के लिए 3,900 करोड़ रुपये दिए थे. वहीं 2025-26 में यह मदद घटकर सिर्फ 427 करोड़ रुपये रह गई. दूसरी तरफ, आने वाले दो सालों में यूपीआई सिस्टम को चलाने का कुल खर्च 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि फ्री यूपीआई के भविष्य को लेकर सवाल तेजी से उठने लगे हैं.

आरबीआई की चेतावनी 

इस पूरे मुद्दे पर आरबीआई गवर्नर ने साफ तौर पर कहा है कि, यूपीआई को हमेशा फ्री में चलाना संभव नहीं है. इस प्रक्रिया में लगने वाले खर्च को किसी न किसी को तो वहन करना ही होगा. वहीं इस विषय पर कंपनियों का कहना है कि, पैसों की कमी के कारण नए फीचर्स लाने और सिस्टम को और अधिक मजबूत बनाने में परेशानी आ रही है. साथ ही दूर-दराज के गांवों तक यूपीआई को पहुंचाने में भी दिक्कत हो रही है. 

बजट 2026 में हो सकता है फैसला

बजट 2026 में तय हो सकता है कि यूपीआई आगे भी पूरी तरह मुफ्त रहेगा या इसके लिए कोई नया रास्ता अपनाया जाएगा. एक विकल्प तो यह है कि सरकार ज्यादा सब्सिडी देकर फ्री मॉडल को जारी रख सकती है.

ताकि आम लोगों और छोटे कारोबारियों पर कोई बोझ न पड़े. वहीं दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सरकार सीमित MDR लागू कर यूपीआई को धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनाने की ओर कदम बढ़ा सकती हैं. 

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