नई दिल्लीः कर्नाटक में शनिवार को चुनाव है और चुनावी सभाओं में तमाम मुद्दों पर बात हो रही है. हालांकि एक ऐसा मुद्दा जो बेहद अहम है लेकिन जिसपर कोई बात नहीं कर रहा है वो है रुपये का मुद्दा. डॉलर के रुपया पिछले 15 महीने के निचले स्तर 67.33 पर आ चुका है. पिछले एक महीने में डॉलर के मुकाबले रुपये में 2 रुपये 29 पैसे की गिरावट आ चुकी है.

साल 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी और तब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहते हुए सुषमा स्वराज ने तत्कालिक मनमोहन सरकार को रुपये के गिरने पर जमकर कोसा था. तब डॉलर के मुकाबले रुपया 60 के स्तर पर जा पहुंचा था और धड़ाधड़ गिर रहा था. तब मोदी यह कहने से नहीं चूके थे कि रुपया का गिरना सरकार का पतन है. अब जब मोदी सरकार में रुपया अपने सबसे निचले स्तरों पर जा रहा है, 68 रुपये के करीब जा पहुंचा है तो सरकार के पास इसका कोई वाजिब जवाब नहीं है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि रुपये का ऑलटाइम लो यानी सबसे निचला स्तर भी मोदी सरकार के समय में नवंबर 2016 में आया था और ये 68.80 रुपये प्रति डॉलर तक जा गिरा था.

फिलहाल रुपया 67 रुपए 33 पैसे पर, सरकार चुप आज जब रुपया 67 रुपए 33 पैसे पर आ चुका है तो पीएम, वित्त मंत्री, विदेश मंत्री समेत पूरी सरकार चुप है. अब विपक्ष के निशाने पर सरकार है क्योंकि लेकिन मुद्दा सिर्फ रुपए के गिरने भर का नहीं है. मुद्दा उन आर्थिक चुनौतियों का है जो मोदी के मिशन-2019 के सामने खड़ी हैं.

रुपए का कमजोर होना सबसे बड़ा संकट अब जब पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और रुपए का कमजोर होना सबसे बड़ा संकट है तब केंद्र सरकार इस पर कुछ नहीं कह रही है. हालांकि इससे भी डरावनी बात ये है कि जानकार मान रहे हैं कि कर्नाटक चुनाव के बाद पेट्रोल 90 रुपए के पार जाएगा और रुपया 70 के पार जाएगा क्योंकि अंतरराष्ट्रीय हालात इसी के संकेत दे रहे हैं.

पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतें अब घटेंगी नहीं क्योंकि कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं. कमजोर रुपया मजबूत होता नहीं दिख रहा है क्योंकि भारत तेल आयात कम कर नहीं सकता. इसके अलावा ईरान पर अमेरिकी पाबंदी का असर तेल उत्पादन पर होगा, जिससे डॉलर ही मजबूत होगा, इसके साथ ही भारतीय रुपया और कमजोर होता चला जाएगा.

पेट्रोल-डीजल की कीमतें, रुपए का गिरना देश की इकोनॉमी के लिए भारी संकट पैदा कर रहे हैं और सरकार इन सब पर ध्यान देने की बजाए राज्यों की चुनावी चकल्लस में उलझी हुई है. अकेले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर्नाटक चुनाव में 15 से ज्यादा रैलियां करने की खबर है और भी कई केंद्रीय मंत्री कर्नाटक के चुनाव प्रचार में हिस्सा ले रहे हैं.

रुपये के 15 महीने के निचले स्तर पर आने का ये होगा नुकसान रुपये की भारी गिरावट से महंगाई का बढ़ना तय है. तेल के दाम बढ़ने से फल-सब्जी और खाने पीने की चीजें महंगी होंगी तो रुपए के कमजोर होने से कार, कंप्यूटर, स्मार्टफोन जैसी वो तमाम चीजें महंगी होंगी-जो आयातित उपकरणों से बनते हैं.

याद कीजिए 1 फरवरी 2015 में मोदी ने बयान दिया था जिसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम कीमतों को उन्होंने अपनी किस्मत से जोड़ा था. अब जब पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगी हुई है और रुपया बेतहाशा गिरता जा रहा है, 2019 के लिए मोदी और सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए इसे अपनी अच्छी किस्मत बता पाना तो नामुमकिन होगा.

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