Indian Rupee: अधिकांश निवेशक शेयर बाजार पर नजर रखते हैं, लेकिन बहुत कम लोग मुद्रा यानी रुपये और डॉलर की चाल पर ध्यान देते हैं. जबकि सच ये है कि रुपये की कमजोरी आपके निवेश रिटर्न को बढ़ाने में मदद कर सकती है. खासकर तब, जब आपने अंतरराष्ट्रीय म्यूचुअल फंड में निवेश किया हो. 

Continues below advertisement

अंतरराष्ट्रीय म्यूचुअल फंड में निवेशअंतरराष्ट्रीय म्यूचुअल फंड निवेशकों का पैसा विदेशी बाजारों और अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं में लगाते हैं. ऐसे में निवेश का रिटर्न सिर्फ शेयर बाजार के प्रदर्शन पर नहीं, बल्कि डॉलर-रुपया विनिमय दर पर भी निर्भर करता है.

ये भी पढ़ें: SBI Rewards: एसबीआई रिवार्ड्स रीडीम करने पर मिल रहे हजारों रुपए, क्या आपके पास आया मेसेज?

Continues below advertisement

उदाहरण के लिए, अगर किसी निवेशक ने उस समय 1 लाख रुपये अंतरराष्ट्रीय फंड में लगाए, जब 1 डॉलर = 75 रुपये था, तो उसका निवेश करीब 1,333 डॉलर के बराबर हुआ. बाद में अगर डॉलर 85 रुपये तक पहुंच जाए, तो बिना बाजार बढ़े भी निवेश की वैल्यू करीब 1.13 लाख रुपये हो सकती है. यानी सिर्फ रुपये की कमजोरी से फायदा मिल सकता है.

बाजार के प्रदर्शन से पड़ता है फर्कअगर वैश्विक बाजार भी अच्छा प्रदर्शन करें, तो रिटर्न और बढ़ सकता है. मान लीजिए फंड डॉलर में 8% रिटर्न दे और उसी दौरान रुपया 3% कमजोर हो जाए, तो भारतीय निवेशक का कुल प्रभावी रिटर्न करीब 11% तक पहुंच सकता है. अंतरराष्ट्रीय फंड सिर्फ मुद्रा लाभ के लिए नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो में विविधता लाने के लिए भी जरूरी हैं. इससे निवेशक अमेरिकी टेक कंपनियों, हेल्थकेयर और वैश्विक ब्रांड्स जैसे सेक्टरों में निवेश का मौका पा सकते हैं.

हालांकि, मुद्रा हमेशा फायदा नहीं देती. अगर रुपया मजबूत होता है, तो रिटर्न कम भी हो सकता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय फंड को लंबी अवधि के निवेश और विविधीकरण के नजरिए से देखना बेहतर माना जाता है. आमतौर पर सलाह दी जाती है कि निवेशक अपने इक्विटी पोर्टफोलियो का 10-15% हिस्सा अंतरराष्ट्रीय फंड में रख सकते हैं.

ये भी पढ़ें: Indian Govt: LPG गैस के स्टॉक पर मोदी सरकार का बड़ा फैसला, तेल कंपनियों से कहा- 1 महीने के लिए...