India Petroleum Consumption: देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खपत पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है और इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार यानी फोरेक्स पर भी पड़ रहा है. साल 2010 से 2014 के बीच देश में कुल 604.43 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) पेट्रोलियम उत्पादों की खपत हुई थी. बढ़ती आबादी, ज्यादा वाहन और तेज आर्थिक गतिविधियों की वजह से तेल की मांग लगातार बढ़ती चली गई है. 

Continues below advertisement

भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में खपत बढ़ने का सीधा असर देश के फोरेक्स यानी विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो देश का आयात बिल भी बढ़ जाता हैं. जिसके असर की बात करें तो, महंगाई और आम लोगों का घरेलू खर्च बढ़ता हैं. जिससे आम लोग आर्थिक दबाव महसूस करते हैं. 

हर साल बढ़ती गई पेट्रोलियम की खपत

Continues below advertisement

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खपत साल-दर-साल लगातार बढ़ती रही है. साल 2010-11 में यह 141.04 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) थी, जो 2011-12 में बढ़कर 148.13 MMT हो गई. इसके बाद 2012-13 में खपत 157.06 MMT तक पहुंची. वहीं 2013-14 में यह बढ़कर 158.20 MMT दर्ज की गई थी. 

2019-20 में पेट्रोलियम खपत का आंकड़ा

वित्त वर्ष 2019-20 में देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कुल खपत 237.63 मिलियन टन रही. इस दौरान कुल खपत में पेट्रोल की हिस्सेदारी 12.6 फीसदी रही थी. जबकि एलपीजी का हिस्सा 11.1 फीसदी दर्ज किया गया था. बढ़ती आबादी और घरेलू जरूरतों के कारण इन दोनों ईंधनों की मांग में लगातार तेजी देखने को मिली है.

तेल आयात से बढ़ता है फोरेक्स पर दबाव

देश अपनी जरूरत का करीब 80% से 85% कच्चा तेल विदेशों से मंगवाता हैं. ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार यानी फोरेक्स रिजर्व और रुपये की कीमत पर पड़ता है. यही वजह है कि तेल की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी भी भारत की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर असर डालने का काम करती है.  

आरबीआई को देना पड़ता हैं दखल

जब दुनिया में किसी युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव की वजह से कच्चे तेल की कीमतें अचानक बढ़ती हैं, तो भारत पर इसका सीधा असर पड़ता हैं. तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. जिससे रुपये पर दबाव बढ़ने लगता है. ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार में दखल देकर डॉलर की सप्लाई बनाए रखनी पड़ती है, ताकि रुपया ज्यादा कमजोर न हो. इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार यानी फोरेक्स रिजर्व में तेजी से कमी आती है. 

यह भी पढ़ें:

महंगाई का महा-विस्फोट, अप्रैल में 8.30% पर पहुंची थोक महंगाई, 42 महीने का रिकॉर्ड टूटा