राजस्थान का कोटा आईआईटी और नीट की तैयारियों के लिए जाना जाता है. लेकिन यहां पर छात्रों के लगातार सुसाइड ने आखिर ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इसे रोकने के लिए जो प्रयास किए गए, वो सारे बेअसर क्यों दिख रहे हैं. इस साल अब तक कोटा में 24 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया है. लेकिन मौत का ये आंकड़ा उतना मायने नहीं रखता है बल्कि इस बात को हम महत्व दें कि सुसाइड को पूरी तरह से रोका जा सकता है.


दूसरी बात ये कि हम चाहें एक युवा को खोएं या आंकड़ा बड़ा हो, ये आंकड़े बढ़ रहे हो या कम हो रहा हो, हर एक युवा जिसे हम सुसाइड से खोते हैं, ये हमारे लिए, हमारे परिवार, देश और दुनिया के लिए एक बड़ा नुकसान है. क्योंकि ये युवा एक तरह से हमारी धरोहर है. लेकिन, यहां पर समझना ये जरूरी है कि एक ऐसी चीज रोकने योग्य है, उसमें हम युवाओं को खो रहे हैं. 


कैसे रोकेंगे सुसाइड?


अब दूसरा सवाल उठता है कि हम सुसाइड को कैसे रोकेंगे? इसको रोकने के लिए बहुत से प्रयास एक साथ करने की जरूरत है और वो लंबे समय तक करने की जरूरत है. बच्चों और युवाओं को उनके तनाव कम करने में मदद की जाए. इसमें कोई दो राय नहीं है. आखिर तनाव कहां से आता है? ये माता-पिता से आता है. उनके साथ बातचीत होनी चाहिए. चाहे मनोवैज्ञानिक उनके साथ बात करें या फिर टीचर उनसे बात करे.



दूसरा प्वाइंट ये कि टीचरों से बात होनी चाहिए. उनको वो स्किल्स मिलनी चाहिए कि जब युवाओं में तनाव हो तो वो क्या बेसिक सपोर्ट दे पाएं. क्या काउंसलिंग दे पाएं. कैसे समझ पाएं कि उनके लिए कुछ करना जरूरी है. तीसरा, छात्रों में हम स्किल सेट बढ़ाएं कि प्रेशर को कैसे हैंडल करना है. और अगर परेशानी आ रहा हो तो तुरत मदद की मांग करें.


अब मदद कैसे मिलेगी? तो इसके लिए हेल्पलाइन सरकार की और अन्य लोगों की भी है. उस हेल्पलाइन के बारे में जानकारी लें. इसके साथ ही, जितने भी ये इंस्टीट्यूट्स हैं, उन इंस्टीट्यूट्स में युवाओं को अलग-अलग माध्यम से साइकोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट का एक्सेस होना जरूरी है. जिससे उन्हें जब भी परेशानी हो तो वे उन तक पहुंच पाएं.    


इसके साथ ही, उनका माहौल, दोस्त और टीचर के साथ रिलेशनशिप पर काम करें, हम उनके वर्क लाइफ बैलेंस बताएं कि ब्रेक लेना, कब ब्रेक लेना, इसके अलावा अन्य खेल कूद की गतिविधियां.



हमें भी समझना होगा


इसके अलावा, ये भी हम समझें कि एक सामाजिक तौर पर हम जो दबाव पढ़ाई और मार्क्स का बनाते हैं, उन प्रेशर के बारे में भी हमें निरंतर काम करना है. ये कैसे होगा? तो इसके बारे में मीडिया में बात करके, रोल मॉडल सेलिब्रिटी की बात करें, हम उन्हें उदारण दें कि कैसे हम मेहनत करके अलग-अलग तरीके से क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकते हैं. सिर्फ एक-दो क्षेत्र में ही सफलता हासिल हो, ऐसा नहीं है. इसलिए सिर्फ उसी के पीछे हम न भागें.


अगर किसी एक एग्जाम में मार्स नहीं आए तो इसका मतलब ये नहीं है कि जीवन आगे नहीं बढ़ेगा. या कोई एक खास फील्ड में एंट्री नहीं मिली तो जीवन रुक जाएगा, ऐसा नहीं है. साथ में, जो कोचिंग इंस्टीट्यूट्स है, वो भी सही जानकारी दें. साथ में, ये जिम्मेदारी लें कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की ग्रोथ भी उनकी जिम्मेदारी है.


हम जब बात एजुकेशन की करते हैं तो एजुकेशन का मतलब सिर्फ मार्क्स नहीं है, एजुकेशन जीवन जीना भी है, ये सोशल इमोशन भी है. मेंटल ग्रोथ भी है. इन सारी चीजों को समझकर उन्हें सपोर्ट दें. इन सारी चीजों को समझना बहुत जरूरी है.


इन चीजों से करें परहेज


इसके अलावा, अगर किसी सुसाइड के बारे में हम बात कर रहे हैं तो ये न बताएं कि उसने कैसे खुदकुशी की. दूसरा हम कारण के बारे में ये पहले से न फैसला कर लें कि यही कारण रहा होगा. क्योंकि, ये दोनों पहलू युवाओं पर असर करते हैं. इसके अलावा, तीसरा जब भी सुसाइड के बारे में बात करें तो हेल्पलाइन्स के बारे में डिटेल्स जरूर दें.


बात ये नहीं है कि किसने क्या कहा और किसने क्या किया. बात ये है कि हम ओवरऑल क्या सपोर्ट सिस्टम बनाते हैं. इसलिए सामाजिक तौर पर वातावरण का ग्रोथ पर बहुत बड़ा रोल है. जब हम वातावरण की बात करते हैं तो चाहे वो पैरेंट्स हो या फिर टीचर हो, एजुकेशनिस्ट हो, मीडिया हो, सोशल मीडिया हो, रोल मॉडल्स हो, सबकी जिम्मेदारी है. तनाव सिर्फ एक जगह से आए ऐसा नहीं है. लेकिन साथ में तनाव की स्किल्स क्या है, ये भी उतनी ही जरूरी है.   




[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]