भारत में अब पेट्रोल और डीजल के अलावा दूसरे फ्यूल पर भी तेजी से काम हो रहा है. इसी कड़ी में देश की सबसे बड़ी कार कंपनी Maruti Suzuki एक बड़ा कदम उठाने जा रही है. केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री Nitin Gadkari ने घोषणा की है कि 5 जून यानी पर्यावरण दिवस के मौके पर कंपनी देश की पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार लॉन्च कर सकती है. खास बात यह है कि यह कार 100% इथेनॉल यानी E100 फ्यूल पर चल सकेगी. सरकार का मानना है कि इससे पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम होगी, प्रदूषण घटेगा और किसानों को भी फायदा मिलेगा.

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फ्लेक्स-फ्यूल कार ऐसी गाड़ी होती है जो पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर बने अलग-अलग फ्यूल मिश्रण पर चल सकती है. अभी भारत में ज्यादातर गाड़ियां E20 यानी 20% इथेनॉल मिश्रण तक ही सपोर्ट करती हैं, लेकिन नई तकनीक वाली यह कार E100 तक सपोर्ट करेगी. यानी इसमें लगभग पूरा इथेनॉल इस्तेमाल किया जा सकेगा. इसके लिए कार में खास तरह का फ्यूल सिस्टम, पाइप, इंजन पार्ट्स और इग्निशन सिस्टम लगाया जाता है ताकि इथेनॉल से इंजन को नुकसान न हो. 

पिछले साल पेश किया था ये वर्जन 

कंपनी पहले भी फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल दिखा चुकी है. पिछले साल जापान मोबिलिटी शो में कंपनी ने अपनी पॉपुलर SUV Maruti Suzuki Fronx का फ्लेक्स-फ्यूल वर्जन पेश किया था, जो E85 यानी 85% इथेनॉल तक के मिश्रण पर चल सकता था. हालांकि अब माना जा रहा है कि कंपनी इससे भी ज्यादा एडवांस मॉडल लॉन्च कर सकती है. नई फ्लेक्स-फ्यूल कार Maruti Suzuki WagonR पर बेस्ड हो सकती है, क्योंकि कंपनी इसका प्रोटोटाइप पहले दिखा चुकी है.

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क्या होता है इथेनॉल?

इथेनॉल एक तरह का बायोफ्यूल है, जो गन्ने, मक्का और दूसरी फसलों से बनाया जाता है. सरकार का मानना है कि अगर भारत में ज्यादा इथेनॉल इस्तेमाल होगा तो विदेशों से कच्चा तेल खरीदने की जरूरत कम होगी. इससे देश का पैसा बचेगा और किसानों की आमदनी भी बढ़ सकती है. यही वजह है कि सरकार लगातार ऑटो कंपनियों को फ्लेक्स-फ्यूल टेक्नोलॉजी अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है.

इस तकनीक को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि भारत में अभी E100 फ्यूल पंप बहुत कम हैं और इस फ्यूल की कीमत और उपलब्धता को लेकर भी स्थिति साफ नहीं है. कुछ ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों में माइलेज पेट्रोल की तुलना में थोड़ा कम हो सकता है. वहीं दूसरी तरफ समर्थकों का कहना है कि लंबे समय में यह तकनीक सस्ती और पर्यावरण के लिए बेहतर साबित हो सकती है.

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