सड़क सेफ्टी को लेकर हर देश के अलग-अलग नियम बने हुए हैं. इसके साथ ही बात जब ड्राइविंग लाइसेंस के प्रोसेस की होती है तो इसके लिए भी बड़ा फर्क देखने को मिलता है. खासकर चीन में ड्राइविंग लाइसेंस हासिल करना आसान काम नहीं है. यहां बस या भारी वाहन चलाने के लिए ड्राइवर्स को सिर्फ थ्योरी या ड्राइविंग टेस्ट नहीं देना होता है बल्कि अनोखे और खतरनाक प्रैक्टिकल टेस्ट से गुजरना भी पड़ता है. 

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चीन में ड्राइविंग लाइसेंस पाने का प्रोसेस कई चरणों में होता है. इसके लिए उम्मीदवारों को ट्रैफिक नियमों के लिए लिखित टेस्ट (थ्योरी) पास करना पड़ता है. इसके बाद बेसिक ड्राइविंग स्किल्स की जांच होती है, जिसमें गाड़ी को सही तरीके से मोड़ना, पार्क करना और बैलेंस बनाए रखना शामिल होता है. 

कितनी खतरनाक होती है प्रक्रिया?

कुछ ट्रेनिंग एक्सरसाइज में ड्राइवर को बस के पहिए पर इतना कंट्रोल रखना होता है कि वो इससे लाइटर को छूकर जला सके. इसका मतलब यह नहीं है कि हर ड्राइवर रोज ऐसा टेस्ट देता है बल्कि यह एक तरह का एडवांस स्किल ट्रेनिंग डेमो होता है, जिससे यह साबित किया जाता है कि ड्राइवर गाड़ी पर कितनी अच्छी तरह कंट्रोल कर सकता है. 

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इसके अलावा बस की प्रक्रिया में ड्राइवर को तंग रास्तों, भीड़भाड़ वाले इलाकों और मुश्किल स्थिति में गाड़ी चलाने की प्रैक्टिस कराई जाती है और इमरजेंसी सिचुएशन से कैसे निपटा जाए, इस बात की भी जांच की जाती है. इन सभी टेस्ट और ट्रेनिंग का मकसद यही होता है कि ड्राइवर सड़क पर पूरी तरह सुरक्षित और जिम्मेदारी से गाड़ी चला सके.

भारत में क्या है प्रोसेस?

वहीं दूसरी ओर भारत में ड्राइविंग लाइसेंस का प्रोसेस इसकी तुलना में बेहद आसान है. यहां सबसे पहले लर्निंग लाइसेंस के लिए थ्योरी टेस्ट होता है, जिसमें ट्रैफिक नियमों की बेसिक जानकारी पूछी जाती है. इसके बाद परमानेंट लाइसेंस के लिए ड्राइविंग टेस्ट होता है, जिसमें गाड़ी को सीधे चलाना, हल्का मोड़ लेना या पार्किंग करना जैसी चीजें शामिल हैं. हाालंकि बस के लिए नियम थोड़े सख्त हैं, लेकिन चीन जैसी कठिन ट्रेनिंग नहीं देखने को मिलती. 

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