जब भी आप कोई नई कार खरीदते हैं, तो आपने एक बात जरूर गौर की होगी. कार भले ही मारुति, हुंडई, टाटा या मर्सिडीज जैसी बड़ी कंपनी की हो, लेकिन उस पर लगे हुए टायर हमेशा एमआरएफ, अपोलो, मिशलिन या गुडइयर जैसी अलग कंपनियों के ही होते हैं. कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब कार कंपनियां इतनी बड़ी गाड़ी, उसका इंजन और पूरी बॉडी खुद बना सकती हैं, तो वे एक छोटा सा टायर खुद क्यों नहीं बनातीं? ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स और बिजनेस विशेषज्ञों के मुताबिक, कार कंपनियों का खुद टायर न बनाना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक बेहद सोची-समझी बिजनेस स्ट्रेटेजी और वैज्ञानिक कारण है.

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टायर बनाना एक पूरी तरह अलग विज्ञान है

कार बनाना और टायर बनाना, दोनों बिल्कुल अलग-अलग फील्ड हैं. कार कंपनियां मुख्य रूप से मैकेनिकल इंजीनियरिंग, डिजाइनिंग और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर काम करती हैं. दूसरी तरफ, टायर बनाना पूरी तरह से केमिकल इंजीनियरिंग और रबर टेक्नोलॉजी का खेल है. टायर बनाने के लिए प्राकृतिक रबर, सिंथेटिक रबर, कार्बन ब्लैक, सल्फर और कई तरह के रसायनों का एक सटीक मिश्रण तैयार करना पड़ता है.

इसके बाद वल्केनाइजेशन जैसी जटिल केमिकल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. कार कंपनियों के पास इस खास केमिकल रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग का सेटअप नहीं होता है, इसलिए वे इस काम को उन कंपनियों को सौंप देती हैं जो इसमें एक्सपर्ट हैं.

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लागत को कम रखना और भारी निवेश से बचना

अगर कोई कार कंपनी खुद टायर बनाने की फैक्ट्री लगाना चाहे, तो उसे रबर प्लांटेशन से लेकर भारी मशीनों और केमिकल लैब में अरबों रुपये का अलग से निवेश करना पड़ेगा. इससे कार बनाने की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी. टायर कंपनियां पहले से ही बड़े पैमाने पर सिर्फ टायर बनाती हैं, जिससे उन्हें इकोनॉमी ऑफ स्केल का फायदा मिलता है और टायर सस्ते पड़ते हैं. कार कंपनियां उनसे थोक में टायर खरीदकर अपनी इनपुट कॉस्ट को कम रखती हैं, ताकि ग्राहकों को कार सही कीमत पर मिल सके.

सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स का बड़ा संकट

दुनियाभर की कार कंपनियां एक बड़ी रणनीति के तहत काम करती हैं, जिसे आउटसोर्सिंग कहते हैं. असल में एक कार के अंदर लगने वाले लगभग 60 से 70 फीसदी पार्ट्स जैसे गियरबॉक्स, लाइट्स, सीट्स, सेंसर और टायर बाहरी सप्लायर्स से ही खरीदे जाते हैं. कार कंपनियां खुद एक असेंबलर की तरह काम करती हैं.

अगर टायर की सप्लाई में कोई दिक्कत आती है, तो कार कंपनियां तुरंत दूसरे टायर ब्रांड से डील कर लेती हैं ताकि कार का प्रोडक्शन न रुके. अगर वे खुद टायर बनाने लगेंगी और रबर या कच्चे माल की कमी हुई, तो उनका पूरा कार प्लांट ठप हो सकता है.

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सुरक्षा का जोखिम और बड़ी जिम्मेदारी

टायर किसी भी वाहन का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा हिस्सा होता है, क्योंकि यही सड़क के सीधे संपर्क में रहता है. टायर में जरा सी भी गड़बड़ी बड़े हादसे की वजह बन सकती है. अगर कार कंपनियां खुद टायर बनाने लगें और टायरों में कोई बड़ी खराबी आ जाए, तो पूरी कार कंपनी की साख और ब्रांड वैल्यू खतरे में पड़ सकती है.

टायर कंपनियां अपने टायरों की सुरक्षा, ग्रिप, गीली सड़कों पर ब्रेकिंग और लाइफ को लेकर सालों तक टेस्टिंग करती हैं. कार कंपनियां इस सुरक्षा जोखिम को खुद पर लेने के बजाय टायर विशेषज्ञों पर भरोसा करना ज्यादा सुरक्षित मानती हैं.

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