Vastu Shastra for Home: भारतीय परंपरा में वास्तु शास्त्र को केवल भवन निर्माण का विज्ञान ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा और प्रकृति के संतुलन का माध्यम माना गया है. यह मान्यता है कि, मनुष्य का जीवन उसका घर और ब्रह्मांड एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं. हालांकि, आज के समय में वास्तु को लेकर कई मान्यताएं, धारणाएं और व्याख्याएं प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ पर सवाल भी उठ रहे हैं. 

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वास्तु को भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप से जोड़ा जाता है, जहां शरीर का दायां हिस्सा पुरुष और बायां भाग स्त्री का प्रतीक है. इसी के आधार पर दिशाओं का निर्धारण किया गया है. पूर्व और पश्चिम को पुरुषों से तो उत्तर और दक्षिण को महिलाओं से जुड़ी दिशा माना जाता है. 

वास्तु के अनुसार नॉर्थ-ईस्ट (ईशान कोण) को सबसे पवित्र माना गया है, जहां से सकारात्मक ऊर्जा और दिव्यता का प्रवाह होता है. 

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दिशाओं का महत्व और वर्गीकरण

वास्तु के मुताबिक कुल 10 दिशाएं मानी गई हैं-

  • पूर्व
  • पश्चिम
  • उत्तर
  • दक्षिण
  • नॉर्थ-ईस्ट (ईशान)
  • साउथ-ईस्ट (आग्नेय)
  • साउथ-वेस्ट (नैऋत्य)
  • नॉर्थ-वेस्ट (वायव्य)
  • भूमि
  • आकाश

प्रत्येक दिशा का अपना एक खास प्रभाव और महत्व बताया गया है.

प्लॉट की दिशा क्या असल में फर्क डालती है?

वास्तु के अनुसार कोई भी प्लॉट चाहे वह किसी भी दिशा में क्यों न हो, अशुभ नहीं माना जाता है. फर्क इस बात से पड़ता है कि, निर्माण किस तरह से किया गया है. 

यानी 'फेसिंग खराब है' वाली बिल्कुल अधूरी है, असल फर्क डिजाइन और लेआउट का है, दिशा का नहीं. 

घर के अलग-अलग हिस्सों का असर

वास्तु मान्यताओं के मुताबिक, घर के प्रत्येक हिस्सा का प्रभाव अलग-अलग होता है-

  • नॉर्थ-ईस्ट (ईशान): धन, शांति और कमाने वाले सदस्य
  • साउथ-ईस्ट (आग्नेय) : ऊर्जा, प्रशासन और महिलाएं
  • साउथ-वेस्ट (नैऋत्य) : घर का मुखिया और स्थिरता
  • नॉर्थ-वेस्ट (वायव्य) : सामाजिक संबंध और गतिशीलता
  • पूर्व-पश्चिम : पुरुषों का स्वास्थ्य और प्रतिष्ठा
  • उत्तर-दक्षिण : महिलाओं का स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति

लेकिन यहां एक बात ध्यान में रखने की जरूरत है, कि इन दावों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. यह पूरी तरह से पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं. 

वास्तु दोष और उनके प्रभाव

कई मान्यताओं में बताया गया है कि, अगर किसी दिशा में दोष हो तो परिवार के सदस्यों पर उसका सीधा प्रभाव पड़ता है, जैसे बीमारी, आर्थिक समस्या या शादी से जुड़ी बाधा.

वास्तु के मुताबिक घर में प्रत्येक सदस्य का स्थान तय होता है, बड़े सदस्यों की दिशा साउथ वेस्ट, साउथ, पश्चिम और छोटे सदस्यों की दिशा नॉर्थ, ईस्ट, नॉर्थ-ईस्ट है.

यह व्यवस्था ऊर्जा संतुलन के नाम पर दी जाती है, लेकिन असल में यह पारंपरिक सामाजिक संरचना को भी प्रतिबिंबित (reflect) करती है. 

आधुनिक समय में वास्तु से जुड़ी चुनौतियां

पुराने समय में लोग घर एक मंजिला बनवाना पसंद करते थे, इस तरह के घर खुले थे और प्राकृतिक वेंटिलेशन के लिए भी उपयुक्त थे. लेकिन आज के अधिकतर घर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग, फ्लैट कल्चर और सीमित स्पेस के साथ आते हैं. इन सबके की वजह से पारंपरिक वास्तु नियमों को लागू करना काफी कठिन हो जाता है. 

वास्तु से जुड़ी आम गलतियां जो अधिकतर लोग करते हैं-

मुख्य द्वार सही, लेकिन सीढ़ियां गलत- लोग मुख्य दरवाजे को शुभ दिशा में बनाते हैं, लेकिन उसी स्थान पर सीढ़ियां या मुमटी बना देते हैं, जिससे पूरा प्रभाव खराब हो जाता है. 

गलत ड्रेनेज सिस्टम- फर्श के अंदर पाइप डालने से उस दिशा का भार बढ़ जाता है, जिससे वास्तु में दोष कहा जाता है. 

नॉर्थ-ईस्ट में गंदगी- इस दिशा को साफ और हल्का रखना बेहद जरूरी है.

टॉयलेट, किचन और मंदिर से जुड़ा वास्तु क्या कहता है?

टॉयलेट- आधुनिक वास्तु के नजरिए से देखें तो टॉयलेट कहीं भी बनाया जा सकता है, लेकिन दिशा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. 

किचन- परंपरागत रूप से साउथ-ईस्ट को किचन के लिए सही दिशा माना जाता है, लेकिन वेंटिलेशन का खास ध्यान रखना चाहिए.

मंदिर- घर में मंदिर को लेकर बड़ा कन्फ्यूजन बना रहता है. कई मान्यताओं में मंदिर नॉर्थ-ईस्ट में बताया गया है, जबकि कुछ परंपराएं इसे साऊथ या वेस्ट में सही मानती हैं. 

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