Vastu Shastra: वास्तु शास्त्र में वास्तु पुरुष की 45 शक्तियों को विशेष महत्व दिया गया है. वास्तु का उद्देश्य जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश जैसे पंचतत्वों के बीच संतुलन स्थापित करना है, ताकि भवन में सकारात्मक ऊर्जा(Positive Energy) का संचार हो और वहां रहने वाले लोगों के जीवन में सुख, शांति और उन्नति बनी रहे. इसमें बताया गया है कि वास्तु शास्त्र केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि दिशाओं में विद्यमान ऊर्जाओं को समझकर उन्हें उचित स्थान देने की प्रक्रिया भी है.

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एस्ट्रोलॉजर नीतिका शर्मा एक प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य, वास्तु विशेषज्ञ और प्रसिद्ध टैरो कार्ड रीडर हैं. उन्हें 10+ वर्षों का अनुभव है. वास्तु शास्त्र, ज्योतिष और पंचतत्वों से जुड़े विषयों पर उनका गहन अध्ययन है. एस्ट्रोलॉजर नीतिका शर्मा के अनुसार, वास्तु पुरुष की 45 शक्तियां घर में ऊर्जा के संतुलन को समझने का महत्वपूर्ण आधार हैं. 

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अगर भवन का निर्माण और उपयोग वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप किया जाए, तो सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बेहतर बना रह सकता है. इसलिए घर बनाते या उसमें बदलाव करते समय दिशाओं और वास्तु नियमों का ध्यान रखना लाभकारी माना जाता है.

क्या हैं वास्तु पुरुष की 45 शक्तियां?

वास्तु पुरुष की 45 शक्तियां विभिन्न दिशाओं और ऊर्जा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं. हर शक्ति का संबंध जीवन के किसी न किसी महत्वपूर्ण पक्ष से माना गया है. अगर भवन का निर्माण वास्तु सिद्धांतों के अनुसार किया जाए और दिशाओं का सही उपयोग किया जाए, तो सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ता है और जीवन अधिक संतुलित व सुखद बनता है. इसी कारण भवन निर्माण से पहले वास्तु विशेषज्ञ से परामर्श लेने की भी सलाह दी गई है.

ब्रह्मा शक्ति: पूरे वास्तु का ऊर्जा केंद्र:

सबसे पहले ब्रह्मा को वास्तु का केंद्रीय ऊर्जा बिंदु बताया गया है. इसी स्थान से पूरे भवन को ऊर्जा और पोषण प्राप्त होता है. यदि यह केंद्र संतुलित न रहे तो निर्णय लेने में कठिनाई, योजनाओं का अधूरा रह जाना और कार्यों में स्थिरता की कमी जैसी समस्याएं आ सकती हैं. इसके लिए हवन, सुगंधित जल का छिड़काव और वास्तु पंचशीर्ष की स्थापना जैसे उपाय बताए गए हैं.

भूधर, आयमा, विवस्वान और मित्र शक्तियों की भूमिका:

भूधर को आधार और स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति बताया गया है, जो किसी भी काम को शुरुआत से पूर्ण होने तक संभालने का कार्य करती है.

आयमा को विकास और विस्तार से जुड़ी शक्ति माना गया है. इसके शुभ रहने पर कार्यों की प्रगति और विकास में सहायता मिलती है.

विवस्वान जीवन में आगे बढ़ने, नए कार्यों की शुरुआत और लक्ष्य की ओर बढ़ने का प्रतीक बताया गया है.

वहीं मित्र शक्ति सहयोग, प्रेरणा और सामंजस्य स्थापित करने वाली ऊर्जा मानी गई है, जिसके शुभ होने पर व्यक्ति को लोगों का साथ और कार्यों में सहयोग प्राप्त होता है.

अन्य प्रमुख शक्तियां और उनका महत्व:

इसके बाद में आप, आपवत्स, सविता, सवित्र, इंद्र, इंद्रजय, रुद्र और रुद्रजय जैसी शक्तियों के बारे में बताया गया है. हर शक्ति का संबंध अलग-अलग गुणों और जीवन के विभिन्न पहलुओं से जोड़ा गया है.

कहीं रोग प्रतिरोधक क्षमता, कहीं नई शुरुआत, कहीं ज्ञान, सुरक्षा, कौशल, विजय, आत्मबल और निर्णय क्षमता जैसी विशेषताओं का उल्लेख वास्तु शास्त्र में मिलता है. हर शक्ति के साथ उसके असंतुलित होने पर होने वाली समस्याएं और उनके उपाय भी बताए गए हैं.

दिशाओं के अनुसार ऊर्जा का विस्तार:

भवन के निर्माण की विभिन्न अवस्थाओं में अन्य शक्तियों का भी विकास होता है. इनमें शिखि (ईश), पर्जन्य, जयंत, महेंद्र, सूर्य, सत्य, भृश और अंतरिक्ष जैसी शक्तियां शामिल हैं.

इन शक्तियों को विचार, एकाग्रता, इच्छाशक्ति, सफलता, नेतृत्व, प्रतिष्ठा, निर्णय क्षमता और आंतरिक विकास से जोड़ा गया है. इनके संतुलित रहने पर व्यक्ति अपने कार्यों में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है, जबकि असंतुलन की स्थिति में लक्ष्य प्राप्ति, सम्मान और कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है.

हर शक्ति के साथ बताए गए हैं समस्याएं और उपाय:

वास्तु शास्त्र की विशेषता यह है कि हर शक्ति के अंतर्गत तीन महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं—

  • उस शक्ति का स्वरूप
  • उसके असंतुलित होने पर होने वाली समस्याएं
  • संतुलन बनाए रखने के लिए बताए गए उपाय

कई स्थानों पर हवन, विशेष वस्तुओं की स्थापना, दिशा के अनुसार प्रतीकों का उपयोग तथा नियमित पूजा जैसे उपायों का भी उल्लेख वास्तु शास्त्र में किया गया है.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.