सावन (Sawan) में शिव मंदिर पहुंचना आसान है, लेकिन पूजा का सही भाव समझना उतना ही जरूरी है. कई बार भक्त पूरी श्रद्धा से जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाते हैं, फिर भी जल्दबाजी में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जो पूजा की मूल भावना के विपरीत मानी जाती हैं.

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10 अगस्त 2026 को उत्तर भारत में सावन का दूसरा सोमवार है. इसी दिन सोम प्रदोष व्रत का भी संयोग बन रहा है. इसलिए सुबह से लेकर शाम तक शिव मंदिरों में भारी भीड़ रह सकती है. पंचांग के अनुसार प्रदोष पूजा का समय स्थान के अनुसार बदल सकता है.

दिल्ली के लिए यह लगभग शाम 7:05 से रात 9:14 बजे तक बताया गया है. ऐसे में मंदिर जाने से पहले पूजा के जरूरी नियम जान लेना उपयोगी होगा. ध्यान रहे, देश के अलग-अलग क्षेत्रों और मंदिरों की परंपराएं अलग हो सकती हैं. 

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पहली गलती: शिवलिंग पर तेज धार से जल डालना

कई भक्त ऊंचाई से या बहुत तेजी से शिवलिंग पर जल डालते हैं. उन्हें लगता है कि अधिक जल और तेज अभिषेक से पूजा ज्यादा प्रभावी होगी. शिव उपासना में ऐसा प्रदर्शन आवश्यक नहीं माना गया है.

जल को शांत और पतली धार में अर्पित करना चाहिए. इसका भाव केवल अभिषेक करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और बेचैनी को शांत करना है. जल चढ़ाते समय ॐ नमः शिवाय का जप किया जा सकता है.

मंदिर में भीड़ हो तो लंबे समय तक जल चढ़ाकर दूसरों का रास्ता रोकना भी उचित नहीं है. थोड़े से जल और सच्चे भाव से की गई पूजा पर्याप्त मानी जाती है.

दूसरी गलती: दूध चढ़ाकर शिवलिंग को बिना जल से साफ किए छोड़ देना

सावन सोमवार पर बहुत से श्रद्धालु शिवलिंग का दूध, दही, शहद या गन्ने के रस से अभिषेक करते हैं. समस्या तब होती है जब इन पदार्थों को चढ़ाने के बाद साफ जल अर्पित नहीं किया जाता.

दूध और मीठे पदार्थ अधिक देर तक शिवलिंग तथा जलहरी पर जमा रहें तो दुर्गंध, फिसलन और कीटों की समस्या हो सकती है. इसलिए मंदिर प्रबंधन की अनुमति से ही इनका प्रयोग करें. अभिषेक के अंत में साफ जल जरूर चढ़ाएं.

यदि मंदिर में केवल जलाभिषेक की व्यवस्था हो तो अपने साथ लाया दूध किसी जरूरतमंद को दिया जा सकता है. शिव पूजा का सार पदार्थ की मात्रा नहीं, श्रद्धा और संवेदनशीलता है.

तीसरी गलती: खंडित या गंदा बेलपत्र अर्पित करना

भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का विशेष स्थान है. सामान्यतः तीन जुड़ी पत्तियों वाला साफ बेलपत्र शुभ माना जाता है. इसकी तीन पत्तियों को शिव के तीन नेत्र, त्रिशूल और सत्व, रज एवं तम, तीन गुणों से जोड़कर देखा जाता है. बिल्वाष्टकम में भी बिल्वपत्र की महिमा बताई गई है.

भक्त अक्सर बेलपत्र की गिनती पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन उसकी स्थिति नहीं देखते. कीड़े लगा, अत्यधिक फटा, सड़ा या गंदा बेलपत्र अर्पित करने से बचना चाहिए. उसे साफ जल से धोकर डंठल की कठोर नोक हटा सकते हैं.

बेलपत्र न मिले तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. केवल स्वच्छ जल से भी शिव पूजा की जा सकती है. किसी पेड़ को नुकसान पहुंचाकर ढेर सारे पत्ते तोड़ना भक्ति नहीं है.

चौथी गलती: हर फूल और पत्ती को शिव पूजा के योग्य मान लेना

अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा में अलग सामग्री चढ़ाने की परंपरा है. इसलिए घर की पूजा की थाली में रखी प्रत्येक वस्तु शिवलिंग पर नहीं चढ़ानी चाहिए.

सामान्य परंपरा में भगवान शिव को सफेद फूल, आक, धतूरा, शमी और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं. वहीं तुलसी और केतकी को शिवलिंग पर चढ़ाने को लेकर अलग-अलग धार्मिक कथाएं तथा क्षेत्रीय मत मिलते हैं. कुछ परंपराएं इन्हें निषिद्ध मानती हैं, जबकि कुछ ग्रंथीय व्याख्याओं में मतभेद दिखाई देते हैं.

इसलिए इंटरनेट पर देखी किसी सूची को अंतिम नियम न मानें. जिस मंदिर में पूजा कर रहे हों, वहां के पुजारी या स्थापित परंपरा से जानकारी लेना ज्यादा उचित है.

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पांचवीं गलती: शिवलिंग की पूरी परिक्रमा करना

मंदिर पहुंचने वाले बहुत से भक्त दूसरे देवताओं की तरह शिवलिंग की भी पूरी गोल परिक्रमा कर लेते हैं. शिव मंदिर की परंपरा में जलहरी, यानी जिस मार्ग से अभिषेक का जल बाहर निकलता है, उसे लांघने से सामान्यतः बचा जाता है.

प्रचलित नियम के अनुसार शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है. भक्त जलहरी तक जाकर वापस उसी दिशा में लौटते हैं. इसका कारण यह है कि जलहरी से बहने वाले अभिषेक जल को पवित्र माना जाता है.

हालांकि मंदिर की संरचना अलग हो सकती है. कुछ मंदिरों में मुख्य शिवलिंग गर्भगृह के भीतर होता है और भक्त बाहरी परिसर की पूरी परिक्रमा करते हैं. इसलिए मंदिर की व्यवस्था और वहां लगे संकेतों को अवश्य देखें.

छठी गलती: नंदी और शिवलिंग के बीच खड़े होकर दर्शन करना

शिव मंदिर में नंदी की प्रतिमा सामान्यतः शिवलिंग के सामने स्थापित होती है. नंदी को भगवान शिव का परम भक्त, वाहन और द्वारपाल माना जाता है. इसी कारण नंदी और शिवलिंग के बीच से गुजरना या देर तक वहां खड़े रहना कई परंपराओं में उचित नहीं माना जाता.

पहले नंदी को प्रणाम करें. इसके बाद एक ओर होकर शिवलिंग के दर्शन करें. भक्त नंदी के कान में अपनी मनोकामना भी कहते हैं, लेकिन इसे शोर या दिखावे में बदलना आवश्यक नहीं है.

भीड़ के समय नंदी के पास फोटो खींचने या वीडियो बनाने के लिए रुकना दूसरे श्रद्धालुओं के दर्शन में बाधा पैदा कर सकता है. मंदिर में सुविधा और अनुशासन भी पूजा का हिस्सा हैं.

सातवीं गलती: पूजा सामग्री, प्लास्टिक और फूल मंदिर में छोड़ देना

सावन सोमवार की सबसे बड़ी गलती शायद पूजा-विधि से नहीं, स्वच्छता से जुड़ी है. भक्त जल की बोतल, दूध की थैली, पॉलिथीन, फूलों के पैकेट और अगरबत्ती के रैपर मंदिर परिसर में छोड़ देते हैं.

भगवान शिव को प्रकृति का देवता माना गया है. ऐसे में उनकी पूजा के बाद मंदिर, नदी या पेड़ के नीचे प्लास्टिक छोड़ना पूजा के मूल भाव के विपरीत दिखाई देता है.

फूल और जैविक सामग्री केवल निर्धारित पात्र में डालें. प्लास्टिक अपने साथ वापस ले जाएं. मंदिर प्रशासन ने जिस सामग्री पर रोक लगाई हो, उसे भीतर न ले जाएं. स्वच्छ मंदिर भी उतना ही बड़ा अर्पण है जितना जल और बेलपत्र.

जलहरी से निकला अभिषेक जल पैरों में न आने दें

यह कोई अलग पूजा सामग्री नहीं, लेकिन सावधानी का जरूरी हिस्सा है. शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल जलहरी के रास्ते बाहर आता है. इसे पवित्र मानते हुए उस पर पैर रखने या उसे लांघने से बचना चाहिए.

कुछ मंदिरों में इस जल के निकास के लिए खुली नाली बनी होती है. भीड़ के दौरान उसे देख पाना कठिन हो सकता है. इसलिए मंदिर में धीरे चलें और बच्चों को भी सावधानी से साथ रखें.

10 अगस्त को शिव पूजा कैसे करें?

सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें. मंदिर पहुंचकर पहले नंदी को प्रणाम करें. इसके बाद शिवलिंग पर शांत धार से जल अर्पित करें. बेलपत्र उपलब्ध हो तो उसे साफ करके चढ़ाएं. सफेद फूल अर्पित कर ॐ नमः शिवाय का जप करें.

इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और गणेशजी का ध्यान करें. अपनी प्रार्थना को केवल धन या सफलता तक सीमित न रखें. विवेक, संयम और सही निर्णय लेने की शक्ति भी मांगें.

सोम प्रदोष का व्रत रखने वाले भक्त शाम के प्रदोष काल में दोबारा शिव पूजा कर सकते हैं. पूजा का समय शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए स्थानीय पंचांग अवश्य देखें.

क्या केवल जल चढ़ाने से पूजा पूरी हो सकती है?

हां. शिव पूजा के लिए महंगी सामग्री आवश्यक नहीं मानी जाती. शुद्ध जल, एक बेलपत्र और श्रद्धापूर्वक किया गया पंचाक्षर मंत्र का जप भी पर्याप्त माना गया है.

अभिषेक की लंबी सूची जुटाने के दबाव में न आएं. मंदिर में दूध बहाने, भीड़ बढ़ाने या बड़ी थाली दिखाने की तुलना में किसी जरूरतमंद की सहायता करना अधिक सार्थक हो सकता है.

पूजा में गलती हो जाए तो क्या करें?

अनजाने में हुई छोटी गलती को लेकर भयभीत होने की जरूरत नहीं है. भगवान शिव को आशुतोष कहा जाता है, अर्थात सरल भाव से प्रसन्न होने वाले. मन ही मन क्षमा मांगें और आगे सही विधि अपनाएं.

पूजा का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, मन को शांत और व्यवहार को बेहतर बनाना है. यदि मंदिर से लौटने के बाद भी क्रोध, अहंकार और असंवेदनशीलता बनी रहे तो केवल सामग्री चढ़ा देना पर्याप्त नहीं है.

10 अगस्त के सावन सोमवार पर जल जरूर चढ़ाएं, लेकिन उसके साथ अपनी एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प भी लें. संभव है, वही इस बार भगवान शिव को अर्पित किया गया आपका सबसे मूल्यवान बेलपत्र हो.

FAQ

10 अगस्त 2026 को कौन-सा सावन सोमवार है?उत्तर भारत में 10 अगस्त को सावन का दूसरा सोमवार है.

शिवलिंग पर जल कैसे चढ़ाना चाहिए?स्वच्छ जल को शांत और पतली धार से अर्पित करना चाहिए.

क्या शिवलिंग की पूरी परिक्रमा करनी चाहिए?प्रचलित मान्यता में जलहरी को लांघे बिना आधी परिक्रमा की जाती है.

शिवलिंग पर कैसा बेलपत्र चढ़ाना चाहिए?साफ, ताजा और सामान्यतः तीन जुड़ी पत्तियों वाला बेलपत्र शुभ माना जाता है.

पूजा में गलती हो जाए तो क्या करें?भयभीत न हों. भगवान शिव से क्षमा मांगकर आगे सही विधि और स्थानीय मंदिर परंपरा का पालन करें.

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