भारतीय ज्योतिष परंपरा में ग्रह, नक्षत्र और राशियों का काफी महत्व है. पुराने समय में विद्वान ज्योतिषी अपने बातों को मात्र गणना या शास्त्रों तक ही सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उसे लोकभाषा और कविताओं के जरिए अन्य लोगों तक भी पहुंचाते थे.

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ऐसी ही एक रोचक ज्योतिष कविता दादा माईराम द्वारा रची गई मानी जाती है, जिसमें उन्होंने 12 राशियों और उनके लग्न के स्वभाव को काफी सरल और लोक शैली में समझाया है. 

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कविता की शुरुआत में दादा माईराम कहते हैं कि, 12 राशियों के लग्न का सही ज्ञान हर किसी को नहीं होता है. ज्योतिष के मुताबिक, ग्रहों की चाल और उनके प्रभाव को समझना भी आसान बात नहीं है. इसलिए जो व्यक्ति लग्न और ग्रहों के प्रभाव को समझ लेता है, वह जीवन के कई रहस्यों को आसानी से जान सकता है. 

दादा माईराम कहते हैं कि, 

बारह लग्न का भेद यह, जान सके ना कोय।ग्रह की चाल समझे वही, ज्योतिष विद्या होय।।

मेष लग्न क्रोधी भया, वृष घर का सरदार।मिथुन रूप श्रृंगार में, रहे सदा तैयार।।

कर्क लग्न सुन्दर दिखे, तन में रोग निवास।सिंह लग्न बलवान है, रखे सदा विश्वास।।

कन्या चतुर विचार की, तुला तौल कर काम।वृश्चिक थोड़ा स्वार्थी, मन में रखे न थाम।।

धनु नीति गुण से भरा, मकर गंभीर स्वभाव।कुंभ भक्ति में लीन है, मीन करे संघर्ष प्रभाव।।

कविता के आखिर में दादा माईराम कर्म का महत्व भी समझाते हैं-

कर्म बिना फल ना मिले, चाहे जो उपाय।भाग्य उसी का जागता, जो कर्मों से पाए।।

इस प्रकार यह कविता मात्र राशियों का स्वभाव ही नहीं बताती है, बल्कि यह भी समझाती है कि, ज्योतिष संकेत देता है, लेकिन जीवन की दिशा आखिर हमारे कर्म ही तय करते है.

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