Gen-Z को आध्यात्म से जोड़ना है तो सबसे पहले एक भहम तोड़ना होगा कि, उनमें कम ध्यान देने वाली पीढ़ी कहकर खारिज करना काफी आसान है, लेकिन समझना मुश्किल. सच्चाई यह है कि, उनका attention span कम नहीं, बल्कि selective है. वे वही देखते हैं, जो उन्हें रिलेटबल, authentic और practical लगता हो. 

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यही वजह है कि, ओटीटी कंटेंट उन्हें इसलिए आकर्षित करता है, क्योंकि उसमें उन्हें अपना जीवन, अपनी भाषा और अपनी उलझनें दिखाई देती हैं. आध्यात्म को अगर प्रासंगिक बनाना है, तो Gen-Z को उपदेश नहीं, अनुभव प्रदान करना होगा. 

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कोविड के बाद और राम मंदिर के उद्घाटन के बाद देशभर के मंदिरों में युवाओं की संख्या एकाएक बढ़ी है. यह मात्र आस्था का उभार नहीं, बल्कि एक खोज का संकेत है. लोग भागदौड़ और मानसिक दबाव के बीच स्थिरता की खोज में है.

पालघर में स्थित गोवर्धन विलेज, जो इस्कॉन का प्रोजेक्ट है, वहां साल 2024 में करीब 10 लाख लोगों का आगमन हुआ. यह आंकड़ा बताता है कि, युवा आध्यात्म से दूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें एक सही दरवाजा चाहिए. 

Gen-Z को आध्यात्म से जोड़ने के लिए 4 स्तंभ जरूरी

Gen-Z को आध्यात्म से जोड़ने के लिए चार स्पष्ट स्तंभों पर काम करने की जरूरत है. ये 4 स्तंभ हैं, Association, Books, Contemplation और Diet.

पहला पहलू Association

जीवन में संगति (Association) का प्रभाव अधिक पड़ता है. इंसान अपने वातावरण के अनुसार ढलता है. अगर युवा ऐसे लोगों के साथ समय गुजारे जो सकारात्मक सोच, अनुशासन और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ रहे हों, तो प्रभाव स्वाभाविक होगा. आध्यात्म अकेले  कमरे में शुरू नहीं होता, बल्कि समुदाय से मजबूत होता है. 

दूसरा पहलू Books

कभी भी केवल पारंपरिक ग्रंथों की बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनकी सुलभ प्रस्तुति भी बेहद जरूरी है. भगवद्गीता जैसी ग्रंथ आज प्रिंट, ई-बुक, ऑडियो बुक और वीडियो व्याख्यान के रूप में आसानी से उपलब्ध है. अगर वही ज्ञान आधुनिक भाषा और संदर्भ में समझाया जाए, तो युवा उसे अपनाते हैं. समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि प्रस्तुति की शैली है.

तीसरा पहलू contemplation

तीसरा पहलू contemplation कहने का मतलब जानकारी जुटाना आसान है, लेकिन उसे जीवन मुश्किल है. जैसे दवा खरीदने से रोग नहीं दूर होता, बल्कि उसे नियमित तौर पर लेना पड़ता है. ठीक उसी तरह रोजाना कुछ मिनटों का आत्मचिंतन, ध्यान या मेडिटेशन बेहद जरूरी है. यह मी टाइम नहीं, बल्कि रीसेट टाइम है, जहां इंसान आत्मा और परमात्मा के संबंध को अनुभव करने की कोशिश करता है. 

चौथा पहलू डाइट

शास्त्रों में कहा गया है , जैसा अन्न वैसा मन, ये केवल कहावत नहीं, बल्कि न्यूरोसाइंस भी इसका समर्थन करता है. असंतुलित खान-पान, बढ़ती डायबिटीज और खराब लाइफस्टाइल मानसिक स्थिरता को प्रभावित करती हैं. सात्विक और संतुलित आहार मन को स्थिर बनाता है, जिससे ध्यान और आत्मनियंत्रण सरल होता हैय 

कुल मिलाकर Gen-Z को आध्यात्म से जोड़ने के लिए भाषाण की जरूरत नहीं, बल्कि संरचना चाहिए. अगर ये 4 स्तंभ संगति, अध्ययन, चिंतन और संतुलित आहार व्यवहार में शामिल करें, तो परिवर्तन स्वाभाविक है. आध्यात्म को आधुनिक नहीं, बल्कि प्रासंगिक बनाना जरूरी है. 

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.