Paddy Nursery Tips: धान की नर्सरी तैयार करते वक्त अगर आप कुछ काम की बातों का ध्यान रख लेते हैं. तो आपकी खेती की लागत आधी हो सकती है. अमूमन किसान पारंपरिक तरीके से नर्सरी डाल देते हैं. जिससे बीज ज्यादा लगता है बीमारियां घेर लेती हैं और बाद में रोपाई के समय लेबर का खर्च भी बढ़ जाता है. आज के इस दौर में खेती का से कम लागत लगाकर ज्यादा और बेहतर पैदावार निकाली जा रही है 

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कई किसानों ने इस तरीके को सही से समझा है. इसलिए आपको बता दें कि धान के पौधों की शुरुआती स्टेज यानी नर्सरी की देखरेख ही फसल का मुनाफा तय करती है. अगर शुरुआत में ही बीज को सही ट्रीटमेंट मिल जाए और खेत की तैयारी दमदार हो तो बाद में खाद और कीटनाशकों पर होने वाला भारी-भरकम खर्चा अपने आप बच जाता है.

बीज का सही ट्रीटमेंट जरूरी

लागत कम करने का सबसे पहला और सटीक जुगाड़ है बीज शोधन यानी सीड ट्रीटमेंट जिसे अक्सर किसान भाई नजरअंदाज कर देते हैं. सीधे बाजार से बीज लाकर खेत में फेंक देने से बेहतर है कि पहले आप उसे फंगीसाइड या किसी जैविक घोल से उपचारित करें. इसके लिए धान को पानी में भिगोते समय उसमें कार्बेंडाजिम जैसी दवा मिला देने से फंगस और जड़ों की बीमारियों का खतरा लगभग खत्म हो जाता है. 

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जब पौधा शुरू से ही तंदुरुस्त रहेगा और जब वह खेत में जाएगा तो उसके बाद उसे एक्स्ट्रा टॉनिक की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसके साथ ही नर्सरी के बेड को समतल बनाना और शाम के वक्त हल्की सिंचाई करना एक सही तरीका है. जिससे बीज का अंकुरण काफी अच्छा होता है. इस तरीके से कम बीज में भी घनी और स्वस्थ पौध तैयार हो जाती है. जिससे बीज पर होने वाला फिजूल खर्च रुक जाता है.

समय पर रोपाई जरूरी 

दूसरा बड़ा जुगाड़ है नर्सरी की उम्र का सही हिसाब-किताब और पोषण का ध्यान रखना. धान की नर्सरी को कभी भी 25 से 30 दिन से ज्यादा पुराना नहीं होने देना चाहिए. सही तौर पर बात की जाए तो 20 से 22 दिन की पौध रोपाई के लिए सबसे बेस्ट होती है. कम उम्र की पौध जब मुख्य खेत में जाती है. तो उसमें कल्ले बहुत तेजी से और ज्यादा संख्या में निकलते हैं. जिससे पैदावार अपने आप बूस्ट हो जाती है. 

इन बातों का रखें ध्यान

इसके अलावा नर्सरी तैयार करते समय ही आखिरी जुताई में गोबर की सड़ी खाद के साथ डीएपी और पोटाश की संतुलित मात्रा देने से मिट्टी की नमी सोखने और रोकने की क्षमता सुधरती है. जब आप स्वस्थ और सही उम्र की पौध उखाड़ते हैं तो उसकी जड़ें टूटती नहीं हैं. जिससे लेबर का समय बचता है और रोपाई के बाद फसल बिना किसी झटके के तुरंत ग्रोथ पकड़ लेती है.

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