Sheep Wool Farming: भेड़ पालना सिर्फ मांस या दूध का ही कारोबार नहीं, बल्कि इससे मिलने वाली ऊन भी किसानों के लिए कमाई का बड़ा जरिया बन सकती है. खासकर सर्दियों के मौसम में ऊन की मांग तेजी से बढ़ जाती है, जिससे भेड़ पालकों को अच्छा फायदा मिलने की संभावना बनती है. आइए जानते हैं भेड़ की ऊन से कितनी कमाई हो सकती है और इस बिजनेस को समझने के लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?
ऊन कतरने का पैसा कितना मिलता है?
गुजरात के कच्छ इलाके में देशी पाटनवाड़ी नस्ल पालने वाले मालधारियों के मुताबिक, ऊन काटने वाले कारीगरों को हर भेड़ पर औसतन 13 से 15 रुपये मिलते हैं. वहीं, राजस्थान के जोधपुर में एक गैर लाभकारी संगठन की मदद से मशीन से ऊन निकालने वाले भेड़ पालकों को अब प्रति भेड़ 50 से 100 रुपये तक की कीमत मिलने लगी है, जो पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा है.
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मंडी में भेड़ की कीमत भी बढ़ाती है फायदा
सिर्फ ऊन ही नहीं, भेड़ को सीधे मंडी में बेचने पर भी अच्छी कमाई हो जाती है. मंडी भाव के मुताबिक भेड़ का औसत दाम करीब 120 रुपये प्रति किलोग्राम रहता है, जबकि प्रति क्विंटल भाव 8,000 से 15,000 रुपये के बीच रहता है. एक भेड़ की औसत बाजार कीमत भी 6,000 से 10,000 रुपये के आसपास होती है.
ऐसे बढ़ती है कमाई की रफ्तार
अगर कोई किसान 15 मादा भेड़ों के साथ बिजनेस शुरू करता है तो अच्छी देखभाल की स्थिति में एक साल के भीतर ही झुंड की संख्या करीब 50 तक पहुंच सकती है, क्योंकि एक भेड़ साल में दो बार प्रजनन करती है और हर बार दो बच्चों को जन्म दे सकती है. इस हिसाब से सिर्फ भेड़ों की संख्या बढ़ाकर ही किसान सारे खर्चे निकालने के बाद लाखों रुपये तक की कमाई कर सकते हैं.
कमाई के दूसरे जरिए
भेड़ पालन से सिर्फ ऊन ही नहीं, बल्कि दूध, मांस, चमड़ा और जैविक खाद बेचकर भी ज्यादा कमाई की जा सकती है. बिहार के सुपौल जिले के एक किसान के मुताबिक भेड़ों से मिलने वाली जैविक खाद 8 से 10 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकती है, जिससे रोजाना 350 से 500 रुपये तक की ज्यादा कमाई हो जाती है.
कैसे लगाएं महीने की कमाई का अंदाजा
अगर सिर्फ जैविक खाद से ही रोजाना 350 से 500 रुपये मिल रहे हैं तो एक महीने में यह आंकड़ा 10,000 से 15,000 रुपये तक पहुंच सकता है. इसमें ऊन, भेड़ बिक्री और दूसरे उत्पादों से होने वाली कमाई जोड़ दी जाए तो झुंड के आकार के हिसाब से महीने की कुल आमदनी कई गुना बढ़ सकती है.
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