चाणक्य अपने श्लोक में सुखी परिवार का वर्णन करते हैं.

वे बताते हैं कि आदर्श गृहस्थ का रूप-स्वरूप कैसा होना चाहिए.

'मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसञ्चितम्।

दम्पत्येः कलहो नाऽस्ति तत्र श्रीः स्वयमागता।।

श्लोक के अनुसार जिस घर में मूर्ख नहीं गुणवान का आदर होता है

वहां हमेशा खुशहाली रहती है और लोग तरक्की करते हैं.

सुखी परिवार को लेकर आचार्य चाणक्य कहते हैं-

जिसका पुत्र वश में हो, स्त्री इच्छानुसार काम करे और

व्यक्ति अपनी कमाई से संतुष्ट हो. ऐसा परिवार सुखी रहता है.