Sadhguru के ‘दामाद’ ने बताई घर पर होने वाली अनोखी बातचीत!
यह बातचीत महाशिवरात्रि से पहले ईशा में हुई, जहां एक प्रसिद्ध संगीतकार-गुरु अपने छात्रों की प्रस्तुति की तैयारी के बारे में बात करते हैं। उन्होंने कहा कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। यदि श्रोता गीत के शब्द न भी समझें, तब भी सुर, ताल और ध्वनि सीधे मन और शरीर को स्पर्श करते हैं। यदि शब्द समझ में आ जाएं तो भाव और गहराई और बढ़ जाती है। इस वर्ष महाशिवरात्रि में वे स्वयं कम गाकर मुख्य रूप से शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं। पहले वे स्वयं प्रस्तुति देते थे, लेकिन इस बार उन्होंने अपने छात्रों को पूरी जिम्मेदारी दी है। ये छात्र गुरुकुल पद्धति में संगीत, नृत्य, योग, संस्कृत आदि की गहन शिक्षा ले रहे हैं। वे कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत की प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत की समृद्ध परंपरा को दिखाएंगे। उन्होंने बताया कि शिक्षक होना कलाकार होने से अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि हर छात्र अलग होता है और उसे अलग तरीके से समझाना पड़ता है। महाशिवरात्रि उनके लिए भी एक परीक्षा जैसी है, क्योंकि मंच पर छात्र होंगे और वे पीछे से मार्गदर्शन करेंगे। गुरुकुल में 7 से 9 वर्ष की आयु के बच्चों का चयन होता है। बच्चे आश्रम में रहकर अनुशासित दिनचर्या, आत्मनिर्भरता और भारतीय संस्कृति के साथ गहराई से जुड़ते हैं। खुली कक्षाओं और प्रकृति के बीच उनका संपूर्ण विकास होता है। व्यक्तिगत जीवन के बारे में उन्होंने बताया कि परिवार के साथ समय कम मिल पाता है, क्योंकि सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। फिर भी जब अवसर मिलता है तो बातचीत संगीत, कार्यक्रमों और विभिन्न अनुभवों पर होती है। सद्गुरु से मिली सबसे बड़ी सीख के बारे में उन्होंने कहा कि यह किसी एक वाक्य में नहीं बताई जा सकती। आश्रम में रहकर भारतीय संस्कृति, परंपरा और विरासत के प्रति उनका गर्व और प्रेम कई गुना बढ़ गया है। उनका मुख्य उद्देश्य है कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए। अंत में उन्होंने कहा कि महाशिवरात्रि का अनुभव शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता — इसे केवल महसूस किया जा सकता है




























