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Tarique Rahman को Army Reshuffle की इतनी जल्दी क्या थी ? असली खेल समझिए! | ABPLIVE

एबीपी लाइव  |  25 Feb 2026 06:00 PM (IST)
ABP News

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने सत्ता संभालते ही तेज़ी से दिखा दिया। 17 फरवरी 2026 को BNP की सरकार की शुरुआत हुई। सिर्फ 5 दिन बाद, 22 फरवरी को, आर्मी के टॉप रैंक में बड़ा फेरबदल का ऑर्डर दिया। 12 फरवरी के चुनाव में BNP को दो-तिहाई बहुमत मिला था। इस फेरबदल में यूनुस के अंतरिम शासन से जुड़े खास अधिकारियों को बदला गया। उनकी जगह BNP के वफादार अधिकारियों को लाया गया। लेफ्टिनेंट जनरल एम मैनुर रहमान चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बने। लेफ्टिनेंट जनरल मीर मुशफिकुर रहमान प्रिंसिपल स्टाफ ऑफिसर बने। मेजर जनरल कैसर राशिद चौधरी को एलीट DGFI का हेड बनाया गया। DGFI यानी डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस। ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद हफीजुर रहमान को इंडिया के डिफेंस एडवाइजरी रोल से वापस बुलाया गया। उन्हें इन्फेंट्री डिवीजन का कमांड दिया गया। यह सिर्फ रूटीन ट्रांसफर नहीं लगता। यह मिलिट्री पावर का कैलकुलेटेड कंसोलिडेशन माना जा रहा है। बांग्लादेश में आर्मी का पॉलिटिकल रोल हिस्टोरिकली मजबूत रहा है। हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट समझिए। 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या हुई। उसके बाद तख्तापलट का दौर शुरू हुआ। जनरल जियाउर रहमान, जो तारिक के पिता थे, मिलिट्री सपोर्ट से पावर में आए। 1981 में उनकी हत्या हो गई। फिर 1982 से 1990 तक जनरल एचएम इरशाद की तानाशाही रही। डेमोक्रेटिक दौर में भी आर्मी का दखल हुआ। 2007 का केयरटेकर सरकार का उदाहरण है। अब तारीख का मूव उसी प्लेबुक जैसा लग रहा है। 2024 में शेख हसीना स्टूडेंट प्रोटेस्ट के बाद बाहर हुईं। यूनुस इंटरिम रूल में आए। अब BNP की जीत के बाद बैरक सिक्योर करना प्रायोरिटी बना। यूनुस-एरा ऑफिसर्स को साइड किया जा रहा है। लेफ्टिनेंट जनरल SM कमरुल हसन को फॉरेन मिनिस्ट्री भेजा गया। उन्हें एम्बेसडर प्रिपरेशन रोल दिया गया। क्या फेरबदल के कोर रीज़न क्या हो सकते हैं? सबसे पहला, लॉयल्टी। एनालिस्ट्स इसे प्राइवेट चेन ऑफ़ कमांड बनाने की कोशिश कह रहे हैं। गोल है बगावत या हसीना लॉयलिस्ट प्लॉट्स को रोकना। DGFI के नए चीफ चौधरी को जल्दी प्रमोट किया गया। ये इंटेलिजेंस अलाइनमेंट का सिग्नल है। अंतरिम सर्विलांस स्ट्रक्चर से दूरी दिख रही है। दूसरा कारण, स्टेबिलिटी। चुनाव के बाद बांग्लादेश नाजुक दौर में है। रोहिंग्या संकट का दबाव है। म्यांमार बॉर्डर पर झड़पें चल रही हैं। हसीना के कार्यकाल के बाद बाढ़, महंगाई और कर्ज का असर है। सेना को मुख्य ड्यूटी पर फोकस करवाना बताया जा रहा है। जनरल वकार-उज-जमान की बढ़ी हुई शक्तियों पर रोक लगाना भी फैक्टर हो सकता है। तीसरा, डिप्लोमैटिक सिग्नलिंग। भारत स्थित सलाहकार को वापस बुलाना सिंबॉलिक माना जा रहा है। हसीना भारत के करीब थी। BNP पर पाकिस्तान और चीन की तरफ झुकाव का टैग लग रहा है।

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