23 साल तक पुश्तैनी पैसा दबाए बैठा रहा SBI, हाईकोर्ट ने लगाई तगड़ी फटकार
आंध्र प्रदेश की एक महिला के पिछले 23 साल से NRI की FCNR जमा और निवेश में कुछ रकम फंसी हुई थी, जिस पर हाई कोर्ट ने आदेश देते हुए रकम जारी करने को कहा है. कोर्ट ने प्रोबेट की शर्त को जरुरी नहीं माना.

आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को फटकार लगाई है. हाई कोर्ट ने एक महिला की वसीयत और उत्तराधिकार से जुड़े पैसों को 23 साल तक रोके रखने पर तुरंत जारी करने का आदेश दिया है.
मामला महिला के NRI भाई की FCNR जमा राशि और अन्य निवेशों से जुड़ा है. इस मामले में खाताधारक की मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिस ने जरूरी कानूनी दस्तावेज और उत्तराधिकार प्रमाण पत्र पेश किए थे, लेकिन बैंक विभिन्न औपचारिकताओं, आंतरिक नियमों और तकनीकी आपत्तियों का हवाला देकर दो दशक से अधिक समय तक उस रकम को अटकाए रहा.
अदालत ने बैंक के इस अड़ियल और असंवेदनशील रवैये पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि वैध उत्तराधिकारी को अपनी ही पुश्तैनी रकम पाने के लिए 23 साल तक अदालतों के चक्कर काटने के लिए मजबूर करना पूरी तरह अनुचित है. हाई कोर्ट ने एसबीआई को निर्देश दिया कि वह पूरी जमा राशि ब्याज सहित तुरंत वारिस को सौंपे.
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1995 की वसीयत में तय था हिस्सा
साल 1995 में महिला के भाई ने अपनी वसीयत तैयार करवाई थी. जिसमें साफ-साफ लिखा था कि संपत्ति का बड़ा हिस्सा भाई और बाकी का हिस्सा चारों बहनों के नाम था. इसके बाद चारों बहनों में एक समान हिस्सा बाटने की बात की गई थी. माना जा रहा है कि यह महिला इन्हीं चारों बहनों में से है और उसने अपने हिस्से की रकम जारी करने की मांग की थी.
SBI ने रखी थी प्रोबेट की शर्त
महिला की मांग पर बैंक ने वसीयत के प्रोबेट से जुड़ी बात पर आपत्ति उठाई थी. प्रोबेट का असली मतलब होता है वसीयत की वैधता की सत्यापन करना. बैंक का कहना था कि रकम जारी करने से पहले इससे संबंधित आदेश जरूरी है.
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कोर्ट ने बैंक की दलील नहीं मानी
जस्टिस रवि चेमलापति की पीठ ने बैंक की बातों को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट का कहना है कि इतने लंबे समय के बावजूद भी SBI यह नहीं बता पाया है कि वसीयत में शामिल किसी अन्य औरत ने महिला के हिस्से पर दावा किया है या नहीं. इसके बाद कोर्ट ने SBI को महिला का वैध हिस्सा जारी करने का आदेश दिया है.





















