तलाक के बाद महिलाओं के पास क्या होते हैं अधिकार, विमेंस डे पर जानें अपने काम की बात
Women Rights After Divorce: तलाक के बाद महिलाओं के पास कई कानूनी अधिकार होते हैं. जिनके बारे में जानकारी होना बेहद जरूरी है. महिला दिवस के मौके पर जान लीजिए अपना हक.

Women Rights After Divorce: 8 मार्च को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. यह दिन सिर्फ महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए नहीं. बल्कि उनके अधिकारों के बारे में जागरूक होने का भी मौका देता है. आज भी समाज में तलाक के बाद कई महिलाएं अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानती हैं. क्योंकि उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की पूरी जानकारी नहीं होती.
भारतीय कानून महिलाओं को कई अहम अधिकार देता है. सही जानकारी होने पर महिलाएं अपने भविष्य को भी सुरक्षित बना सकती हैं. इसलिए जरूरी है कि हर महिला को यह पता हो कि तलाक के बाद उसके पास कौन-कौन से कानूनी अधिकार होते हैं और वह जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कैसे कर सकती है.
भरण-पोषण और आर्थिक सुरक्षा का अधिकार
तलाक के बाद महिलाओं के लिए फाइनेंशियल स्टेबिलिटी सबसे अहम मुद्दों में से एक होती है. इसी वजह से कानून उन्हें भरण-पोषण यानी गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार देता है. महिला अदालत से तलाक की प्रोसेस के दौरान या उसके बाद आर्थिक सहायता की मांग कर सकती है. यह सहायता उसके रहने, खाने, स्वास्थ्य और रोजमर्रा के खर्चों को संभालने में मदद करती है. अदालत गुजारा भत्ता तय करते समय कई बातों पर ध्यान देती है.
जैसे पति-पत्नी की आय, उनकी जीवनशैली, शादी की अवधि, उम्र, स्वास्थ्य और बच्चों की जिम्मेदारी. कुछ मामलों में यह रकम हर महीने दी जाती है. जबकि कई बार एकमुश्त भुगतान भी तय किया जाता है. अगर पति तय की गई राशि देने से इनकार करता है,. तो अदालत उसके वेतन से कटौती, संपत्ति जब्ती या अन्य कानूनी कार्रवाई का आदेश दे सकती है. बता दें कि नौकरी करने वाली महिलाएं भी जरूरत पड़ने पर गुजारा भत्ता मांग सकती हैं.
वैवाहिक घर में रहने का अधिकार
तलाक की प्रोसेस शुरू होने के बाद कई महिलाओं को यह चिंता रहती है कि उन्हें घर से निकाल दिया जाएगा. लेकिन कानून इस मामले में साफ तौर पर महिलाओं की सुरक्षा करता है. पत्नी को उस घर में रहने का अधिकार होता है जहां वह अपने पति के साथ रह रही थी. भले ही उस घर की मालिकाना हक उसके नाम पर न हो. बिना अदालत की अनुमति के उसे जबरन घर से नहीं निकाला जा सकता.
घरेलू हिंसा से जुड़े कानून भी महिलाओं को एक्सट्रा सेफ्टी देते हैं. अगर ससुराल पक्ष की ओर से किसी तरह का दबाव, हिंसा या दुर्व्यवहार होता है. तो महिला अदालत से दूसरे सेफ घर की मांग कर सकती है. जब तक तलाक की कानूनी प्रोसेस पूरी नहीं हो जाती तब तक महिला को वैवाहिक घर से बेदखल नहीं किया जा सकता.
यह भी पढ़ें: ईरान-इजरायल की जंग के बीच चांदी में पैसा लगाएं या सोने में? जानें कमाई का तरीका
बच्चे की कस्टडी से जुड़े अधिकार
तलाक के बाद बच्चों की जिम्मेदारी और उनकी परवरिश का सवाल सबसे अहम मुद्दों में से एक होता है. भारत में अदालतें इस मामले में माता-पिता की इच्छा से ज्यादा बच्चे के हित को प्रायरिटी देती हैं. फैसले के दौरान बच्चे की उम्र, उसकी पढ़ाई, भावनात्मक जरूरतें और दोनों माता-पिता की देखभाल करने की क्षमता जैसे पहलुओं को देखा जाता है. आमतौर पर छोटे बच्चों की कस्टडी मां को दी जाती है.
क्योंकि माना जाता है कि शुरुआती उम्र में मां की देखभाल ज्यादा जरूरी होती है. हालांकि हर मामले में अदालत परिस्थितियों के आधार पर फैसला करती है. कस्टडी दो तरह की होती है. पहली कानूनी कस्टडी जिसमें बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़े फैसले लिए जाते हैं. दूसरी फिजिकल कस्टडी जिसमें यह तय होता है कि बच्चा किसके साथ रहेगा.
यह भी पढ़ें: होली के रंगों से बिगड़ गया कार का लुक? घर पर ऐसे हटाएं जिद्दी दाग
Source: IOCL




























