Insurance Policy News: अक्सर लोग इंश्योरेंस प्रीमियम भरने में चूक जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कभी कभी बैंक अकाउंट में पैसे नहीं होते, बैंक का ट्रांजेक्शन फेल होता है या भूल जाते हैं. ऐसे में डर रहता है कि प्रीमियम नहीं भरा या लेट भरा तो कहीं पॉलिसी बंद न हो जाए. 

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अच्छी बात यह है कि भारत में लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी की ड्यू डेट निकल भी गई तो पॉलिसी तुरंत बंद नहीं होगी. इसके लिए ज़्यादातर इंश्योरेंस कंपनियां ग्रेस पीरियड प्रदान करती हैं. मासिक प्रीमियम प्लान के लिए यह आम तौर पर करीब 15 दिन का होता है, जबकि तिमाही, छमाही और सालाना प्रीमियम पॉलिसी के लिए लगभग 30 दिन का समय मिलता है. यह इंश्योरेंस कंपनी और पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर करता है.  

पॉलिसी लैप्स होने पर क्या होता है?

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आमतौर पर इस पॉलिसी में सेविंग्स या मैच्योरिटी जैसा कोई फ़ायदा नहीं होता है. अगर पॉलिसी चूकी तो फाइनेनशियल सुरक्षा पूरी तरह से बंद कर दी जाती है. वहीं परंपरागत रणनीति में कभी कभी पॉलिसी का पैसा वापस होने पर मिल रहे फायदे में कटौती कर दी जाती है. लेकिन फिर भी, सुरक्षा का मूल स्तर आमतौर पर काफी कम हो जाता है. लोगों को इस बारें में जानकारी भी नहीं होती है. 

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टर्म इंश्योरेंस के बंद पर आर्थिक जोखिम ?

अक्सर जो परिवार टर्म इंश्योरेंस पर बहुत ज़्यादा भरोसा करते हैं, उनके लिए पॉलिसी का बंद हो जाना बड़े आर्थिक जोखिम का वजह बन सकता है. ऐसे में एक बात तो साफ है कि इन्वेस्टमेंट-लिंक्ड पॉलिसी के उलट, टर्म इंश्योरेंस का मकसद सिर्फ़ सुरक्षा देना होता है. अगर कवर खत्म हो जाता है और व्यक्ति बाद में ज़्यादा उम्र में या नई मेडिकल कंडीशन के साथ नई पॉलिसी खरीदने की कोशिश करता है तो प्रीमियम काफ़ी ज़्यादा हो सकता है. 

यही वजह है कि फाइनेंशियल जानकार आमतैर पर लोगों को सलाह देते हैं कि वे अस्थायी आर्थिक तंगी के समय भी इंश्योरेंस प्रीमियम को अहमियत दें, क्योंकि मौजूदा पॉलिसी को बनाए रखने की मुकाबले में बाद में खोई हुई इंश्योरेंस पॉलिसी को दोबारा लेना अक्सर कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है.

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