Fire Safety Alert: यूपी के गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके स्थित गौर ग्रीन सोसाइटी में 29 अप्रैल को आग ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया. आग नौवीं मंजिल से शुरू होकर कुछ ही देर में ऊपरी मंजिलों तक फैल गई थी. इस घटना ने अब एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर फ्यूचर में आपके घर में ऐसी घटना हो जाए तो आखिरकार आप आर्थिक नुकसान से कैसे बचेंगे?

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फ्लैट में आग लगने पर हर्जाना कौन देगा?

यह बात इस पर निर्भर करती है कि आग लगने की वजह क्या थी?

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अगर आपके फ्लैट का बीमा है- अगर फ्लैट या फिर घर का बीमा कराया गया है तो नुकसान की भरपाई आसान हो जाती है.होम स्ट्रक्चर इंश्योरेंस- वहीं अगर बिल्डिंग या फिर फ्लैट के ढांचे का बीमा है तो दीवारों, छत और स्ट्रक्चर को हुए नुकसान की भरपाई बीमा कंपनी करती है.होम कंटेंट इंश्योरेंस- अगर आपके घर के सामान जैसे फर्नीचर, TV, फ्रिज, इलेक्ट्रॉनिक्स या गहनों का बीमा कराया है तो उसका क्लेम भी किया जा सकता है.

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अगर आग लापरवाही से लगी हो तो

अगर आग शॉर्ट सर्किट, गैस लीक या फिर किसी लापरवाही की वजह से लगी है तो नुकसान की जिम्मेदारी फ्लैट मालिक या किरायेदार की हो सकती है.वहीं अगर इससे पड़ोसी के घर को या फिर फ्लैट को नुकसान पहुंचता है तो वे कानूनी कार्रवाई भी कर सकते हैं.

बिल्डर या मेंटेनेंस टीम की गलती

जान लें अगर आग बिल्डिंग की खराब वायरिंग, खराब फायर सिस्टम या फिर घटिया निर्माण की वजह से लगी है तो बिल्डर या मेंटेनेंय कंपनी इसकी जिम्मेदार मानी जा सकती है.

RWA की क्या जिम्मेदारी होती है?

ज्यादातर सोसायटी में RWA कॉमन एरिया का बीमा कराती है. अगर आग लिफ्ट, लॉबी या फिर किसी कॉमन एरिया से शुरू हुई है तो सोसायटी की बीमा पॉलिसी से राहत मिल सकती है. लेकिन ध्यान रहें अगर सोसायटी के पास Fire NOC नहीं है या फिर सुरक्षा नियमों का पालन नहीं किया गया है तो सोसायटी के निवासी Consumer Court में शिकायत कर सकते हैं.

किरायेदार और मकान मालिक की जिम्मेदारी क्या है?

मकान मालिक की बात करें तो फ्लैट के ढांचे के नुकसान के लिए जिम्मेदार होता है और वहीं किरायेदार अपनी पर्सनल सामान के नुकसान के लिए खुद जिम्मेदार होता है.

कानूनी मदद कैसे लें?

सबसे जरूरी बात अगर कोई व्यक्ति जिम्मेदारी लेने से मना करता है तो आप कुछ जरूरी कदम उठा सकते हैं जैसे...

  • फायर ब्रिगेड की Incident Report लें
  • बैंक और इंश्योरेंस कंपनी को तुरंत सूचना दें.
  • जरूरत पड़ने पर Consumer Court में शिकायत करें.