CTC vs In-Hand: अगर हम किसी की 50-60 लाख सैलरी सुनते हैं तो लगता है कि उसकी हर महीने की कमाई भी बेहद ज्यादा होगी. सैलरी का बड़ा आंकड़ा देखकर लगता है कि ज्यादा CTC मतलब ज्यादा कमाई, लेकिन टेक इंडस्ट्री में यह हमेशा सच नहीं होता. कई बार कम CTC वाला कर्मचारी हर महीने ज्यादा इन-हैंड सैलरी ले जाता है.
इस बात की चर्चा तब शुरू हुई जब Y Combinator समर्थित स्टार्टअप Wavelength के फाउंडिंग इंजीनियर देवांश भंडारी ने X पर एक पोस्ट शेयर की. उन्होंने बताया कि उनके दोस्त का Google में 62 लाख CTC है, जबकि दूसरा दोस्त रिमोट कॉन्ट्रैक्टर है जो सालाना 36 लाख कमाता है.
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Google के ₹62 लाख CTC का गणित
- देवांश के मुताबिक, Google के 62 लाख पैकेस में
- ₹22 लाख बेसिक सैलरी
- ₹35 लाख RSU (स्टॉक ग्रांट)
- ₹5 लाख बोनस
RSU तुरंत कैश के रूप में नहीं मिलते. ये 4 साल में धीरे-धीरे मिलते हैं. इसी वजह से टैक्स कटने के बाद कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी करीब ₹1.5 लाख से ₹1.8 लाख प्रति माह रहती है.
36 लाख वाले रिमोट कॉन्ट्रैक्टर की कमाई
रिमोट कॉन्ट्रैक्टर की ज्यादातर कमाई सीधे कैश में मिलती है. आयकर अधिनियम की धारा 44ADA के तहत योग्य पेशेवर अपनी टोटल इनकम का सिर्फ 50 प्रतिशत हिस्सा टैक्सेबल दिखा सकते हैं. इससे टैक्स कम लगता है. देवांश के मुताबिक, टैक्स के बाद ऐसे कॉन्ट्रैक्टर को हर महीने लगभग 2.7 लाख तक इन-हैंड मिल सकता है.
क्यों होता है इतना बड़ा फर्क?
इसकी सबसे बड़ी वजह है सैलरी स्ट्रक्चर
बड़ी कंपनियां CTC में बोनस और स्टॉक जोड़ती है, जो तुरंत हाथ में नहीं आते. दूसरी तरफ, कॉन्ट्रैक्ट रोल में ज्यादातर भुगतान सीधे कैश में होता है.
लोगों की क्या रही प्रतिक्रिया?
कई यूजर्स ने कहा कि पूरे RSU को CTC में जोड़कर दिखाना भ्रम पैदा करता है. वहीं कुछ लोगों का कहना था कि स्टॉक लंबे समय में फायदा देते हैं, लेकिन अगर बात हर महीने हाथ में आने वाले पैसे की हो तो रिमोट कॉन्ट्रैक्टर आगे निकल सकता है.
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क्या सिर्फ इन-हैंड सैलरी देखनी चाहिए?
नहीं, बड़ी कंपनियों में नौकरी की सुरक्षा, हेल्थ बेनिफिट्स, ब्रांड वैल्यू और करियर ग्रोथ जैसे फायदे मिलते हैं. वहीं रिमोट जॉब में ज्यादा कैश और कम खर्च का फायदा होता है.
