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Hindi Vs Marathi:भाषा पर शुरू सियासी 'तमाशा'! Sandeep Chaudhary | Udhav Thakkarey | Marathi

एबीपी न्यूज़  |  06 Jul 2025 09:36 PM (IST)
ABP News

देश में भाषा थोपने के मुद्दे पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है. इस पर एक वक्ता ने कहा कि एक भाषा को गाली देकर दूसरी भाषा को बेहतर नहीं बनाया जा सकता. उन्होंने भाषा थोपने के प्रयासों के ऐतिहासिक उदाहरण दिए. 1938 में मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस पार्टी के प्रमुख सी. राजगोपालाचारी ने हिंदी को अनिवार्य कर दिया था. इस पर अन्नादुराई और जस्टिस पार्टी ने आंदोलन किया, जिसके बाद राजगोपालाचारी को इस्तीफा देना पड़ा और ब्रिटिशर्स ने यह फैसला वापस ले लिया. दूसरा उदाहरण पूर्वी पाकिस्तान का है, जब पाकिस्तान बनने के बाद उर्दू को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया गया. पूर्वी पाकिस्तान में इसका विरोध हुआ क्योंकि वहाँ बंगाली चलती थी. छात्रों पर गोली चलने के बाद एक बड़ा आंदोलन हुआ और 1971 में बांग्लादेश एक अलग राष्ट्र बन गया. 1968 में तमिलनाडु में भी DMK की सरकार बनी, जो अभी तक सत्ता में है. वक्ता ने कहा कि यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है और भाषा को अपनी तहजीब और कल्चर से जोड़कर देखा जाता है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि राजभाषा है. 4 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने इसे राजभाषा माना था. आज की तारीख में हमारे संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं हैं, जिनमें उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी शामिल हैं. केंद्र स्तर पर हिंदी या अंग्रेजी किसी का भी इस्तेमाल हो सकता है. वक्ता ने कहा कि अगर कोई हिंदी को मातृभाषा या राष्ट्रभाषा बनाना चाहता है, तो उसे संवैधानिक दर्जा देना चाहिए. उन्होंने यह भी बताया कि ज्यादा भाषाएं सीखने से कॉग्निटिव फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ती है, प्रॉब्लम सॉल्विंग बेहतर होती है और मेमोरी बढ़ती है. नॉर्थ ईस्ट में लोग कई भाषाएं बोलते हैं. वक्ता ने जोर दिया कि चीजों को थोपने से काम नहीं चलेगा, बल्कि बातचीत से रास्ता निकालना चाहिए. उन्होंने उद्धव ठाकरे के मराठी भाषा के लिए 'गुंडा' होने के बयान और नितेश राणा द्वारा बॉलीवुड अभिनेताओं का जिक्र करने का भी उल्लेख किया. वक्ता ने कहा कि थोपने की कोशिश करने पर यू-टर्न होता है, जैसा कि दिल्ली में गाड़ियों वाली बात में देखा गया था.

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