Viral Post: दिल्ली में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत लोग पुराने डॉक्यूमेंट खंगाल रहे हैं. इस बीच गुरुग्राम में रहने वाले एक शख्स के हाथ ऐसा डॉक्यूमेंट लगा जिसने, उन्हें करीब 30 साल पुरानी यादों में पहुंचा दिया. दरअसल वोटर लिस्ट से जुड़े कागज तलाश के समय उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का स्कूल का एक पुराना सर्टिफिकेट मिला, जिसे देखकर उनके स्कूल के दिन फिर से आंखों के सामने घूम आए.
यह सर्टिफिकेट उसे दौर की याद दिलाता है, जब एएमयू में पढ़ने के लिए कई हिंदू परिवार अपने बच्चों को उर्दू सीखाते थे और स्कूल में होने वाली सीरत प्रतियोगिता में भी हिस्सा लेते थे. अब यह कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है.
एसआईआर के कागज ढूंढते समय हाथ लगा, 30 साल पुराना सर्टिफिकेट
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में 46 वर्षीय शरद कुमार शर्मा अपना करीब 30 साल पुराना एएमयू सिटी हाई स्कूल का सर्टिफिकेट दिखाते नजर आते हैं. यह सर्टिफिकेट 1995 का है, जिसमें उन्हें पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर आधारित सहित प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए सम्मानित किया गया था.
खास बात यह है कि सर्टिफिकेट में यह भी लिखा है कि वह एक नॉन मुस्लिम छात्र होने के बावजूद इस प्रतियोगिता में शामिल हुए थे. शरद कुमार के अनुसार वह अपने परिवार के पुराने वोटर रिकॉर्ड और डॉक्यूमेंट ढूंढ रहे थे, क्योंकि 2002 से 03 में अलीगढ़ से दिल्ली आने के बाद के रिकॉर्ड तलाशना आसान नहीं था. इस दौरान एक पुराने कार्डबोर्ड बॉक्स से यह पीला पड़ चुका सर्टिफिकेट मिला. उन्होंने बताया कि वह इस सर्टिफिकेट के बारे में पूरी तरह भूल चुके थे.
दोस्तों से हुई फिर बातचीत
सर्टिफिकेट मिलने के बाद शरद शर्मा ने अपने पुराने साथियों से कांटेक्ट किया. बातचीत के दौरान सभी ने उसे दौर को याद किया, जब एएमयू में एडमिशन के लिए उर्दू सिखाना आम बात थी. उन्होंने बताया कि कई हिंदू परिवार भी अपने बच्चों को उर्दू की ट्यूशन दिलवाते थे, क्योंकि एएमयू में एडमिशन और पढ़ाई में इसकी जरूरत होती थी. शरद शर्मा ने यह भी बताया कि जब उन्होंने यह सर्टिफिकेट अपने बच्चों को दिखाया तो उनका पहला सवाल था पापा सीरत क्या होती है. इसी सवाल ने उन्हें एहसास कराया कि आज की पीढ़ी और उनके बचपन के दौर में कितना बदलाव आ चुका है.
सोशल मीडिया पर लोगों के रिएक्शन
यह कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग अपनी-अपनी यादें शेयर कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा उसे दौर में शिक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता थी न कि धर्म. वहीं दूसरे ने कहा पुराने कागज कभी-कभी ऐसी यादें लौटा देते हैं, जो जिंदगी भर साथ रहती है. एक और यूजर ने कमेंट किया एएमयू की यही खूबसूरती थी वहां अलग-अलग समुदाय के बच्चे साथ पढ़ते थे और सीखते थे. एक और यूजर ने टिप्पणी की कभी-कभी सबसे कीमती चीज वहीं निकल आती है, जिसे हम ढूंढ भी नहीं रहे होते हैं.
