अगर आप अपने आसपास इलेक्ट्रॉनिक गैजेट पर नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि अधिकतर का कलर ब्लैक होता है. अगर आप स्मार्ट टीवी, मॉनिटर और साउंडबार जैसे गैजेट देखेंगे तो ये अधिकतर ब्लैक होते हैं, वहीं लैपटॉप में ब्लैक और सिल्वर ज्यादा देखने को मिलता है. स्मार्टफोन की बात करें तो अधिकतर लोगों के पास ब्लैक या व्हाइट कलर का फोन दिखेगा. अब कंपनियां दूसरे कलर में भी स्मार्टफोन और दूसरे गैजेट लॉन्च करने लगी हैं. लेकिन अब भी अधिकतर गैजेट ब्लैक क्यों होते हैं? आज हम इसका जवाब जानेंगे.

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हीट मैनेजमेंट

ब्लैक कलर को माना जाता है कि यह हीट को मैनेज करने के काम आता है. कोई भी डिवाइस जब एक्टिव होता है तो इसके कंपोनेंट से कुछ हीट जनरेट होती है. ब्लैक कलर इस हीट को एब्जॉर्ब कर लेता है और उसे वापस नहीं जाने देता. इसीलिए अधिकतर इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट ब्लैक होते हैं.

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लाइट मैनेजमेंट और कम लागत

मॉडर्न इलेक्ट्रिक गैजेट की शुरुआत से ही यह माना जाता है कि उनमें यूज होने वाली सेमीकंडक्टर फोटो-सेंसेटिव होते हैं. अगर इन पर ज्यादा लाइट पड़ेगी तो ये खराब हो सकते हैं. इसलिए ब्लैक कलर इंटरनल पार्ट्स को अंधेरे में रखता है. इसके अलावा एक ही कलर में ज्यादा प्रोडक्ट्स बनाने में लागत कम आती है, जिससे कंपनियों को कीमत कम रखने में मदद मिलती है.

इमर्सिवनेस

ब्लैक कलर को इमर्सिव माना जाता है. इसलिए आप देखेंगे कि अधिकतर स्मार्ट टीवी और मॉनिटर आदि डिस्प्ले वाली चीजें ब्लैक होती है. यह इसलिए होता है क्योंकि ब्लैक कलर अलग से यूजर का ध्यान अपनी तरफ नहीं खींचता और वह आसानी से डिस्प्ले को देख पाता है. ब्लैक के अलावा दूसरा कलर ध्यान भटका सकता है. 

लॉन्ग लास्टिंग है ब्लैक कलर

अधिकतर गैजेट के एक्सटर्नल पार्ट्स प्लास्टिक से बने होते हैं. अगर इनमें ब्लैक की जगह व्हाइट कलर यूज किया जा तो सनलाइट या UV किरणों से रंग खराब हो सकता है. व्हाइट कलर के येलो होने के बहुत से एग्जांपल हमारे सामने हैं. इसी तरह दूसरा कोई कलर समय के साथ फेड हो सकता है, जबकि ब्लैक में इस तरह की दिक्कत नहीं आती.

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