टेक्नोलॉजी की दुनिया में सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं बल्कि इंटरनेट भी लोगों की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चुका है. अब लोगों को बिना इंटरनेट रहना काफी मुश्किल लगता है. लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने के बाद से इंटरनेट का इस्तेमाल भी काफी हद तक बदल चुका है. दरअसल, पहले के मुकाबले अब ऑनलाइन जो भी कंटेंट आ रहा है उसमें कहीं न कहीं एआई का इस्तेमाल देखने को मिल रहा है.

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दरअसल, ऑनलाइन अब ज्यादातर कंटेंट एआई की मदद से तैयार किए जा रहे हैं. हाल ही में Pew Research की एक स्टडी में भी इस बात का खुलासा हो चुका है. इस स्टडी के बाद से फिर से एक बार डेड इंटरनेट थ्योरी की चर्चा होने लगी है. आइए जानते हैं कि क्या है इस थ्योरी का मतलब.

क्या है Dead Internet Theory?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, Dead Internet Theory एक ऐसी थ्योरी है जिसका मानना है कि अब इंटरनेट का ज्यादातर हिस्सा एआई की मदद से तैयार हो रहा है. इस थ्योरी को मानने वाले लोगों का कहना है कि आज इंटरनेट पर दिखाई देने वाले ज्यादातर कंटेंट बॉट्स, एल्गोरिदम और AI की मदद से तैयार हो रहे हैं.

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हालांकि, ये कोई वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित सिद्धांत नहीं है. लेकिन AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने इसके कुछ दावों को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है.

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रिसर्च में क्या आया सामने

जानकारी के मुताबिक, Pew Research के शोधकर्ताओं ने पिछले पांच वर्षों के दौरान इंटरनेट पर मौजूद करीब 5 लाख अंग्रेजी भाषा वाले वेबपेज का एनॉलिसिस किया है. बता दें कि इस डेटा में 2022 से पहले का भी डेटा शामिल है जब ओपनएआई का चैटजीपीटी की शुरूआत ही हुई थी.

शोधकर्ताओं ने AI डिटेक्शन टूल Open Pangram की मदद से ये पता लगाने की कोशिश की कि किसी कंटेंट में AI द्वारा लिखे या एडिट किए जाने की चीजें मौजूद हैं या नहीं. इसके अलावा जुलाई 2026 में पब्लिश हुई करीब 10,000 वेबपेज का अलग सैंपल लेकर लैंग्वेज और शब्दों के पैटर्न को भी चेक किया गया है.

.com वेबसाइटों पर AI कंटेंट ज्यादा

स्टडी के अनुसार AI-बेस्ड कंटेंट के सबसे ज्यादा .com डोमेन पर दिखाई दिए हैं. लगभग हर 10 में से एक वेबपेज में एआई द्वारा लिखे हुए कंटेंट मिले हैं. इसके मुकाबले .org वेबसाइटों में ये हिस्सा करीब 4.6 प्रतिशत रहा जबकि .edu और .gov डोमेन पर AI से जुड़े कंटेंट का प्रतिशत लगभग 1 रहा है.

हर AI डिटेक्शन सही नहीं होता

शोधकर्ताओं ने ये भी साफ कर दिया है कि हर एआई डिटेक्शन टूल पूरी तरह से सही नहीं होता है. कई बार इंसानों ने जो कंटेंट लिखा होता है उसे टूल एआई के द्वारा लिखा हुआ कंटेंट बता देता है जबकि AI से तैयार कंटेंट को इंसाना द्वारा कंटेंट भी मान लिया जाता है.

फिर भी स्टडी में करीब 10 प्रतिशत सैंपल में कंटेंट में AI के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक, ये आंकड़ा देखने में छोटा लग सकता है क्योंकि इंटरनेट पर मौजूद बहुत-सा कंटेंट कई साल पुराना हो चुका है.

क्या है सबसे बड़ी चुनौती

AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सिर्फ एआई कंटेंट की एक समस्या नहीं है बल्कि असली समस्या ये है कि अब इन्हें वेरिफाई कैसे किया जाए. अब इंटरनेट पर एआई का काफी तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में सभी कंटेंट को वैरिफाई करना एक सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है. इससे ये साफ हो जाता है कि आने वाले समय में इंटरनेट पर सिर्फ जानकारी खोज लेना ही काफी नहीं होगा बल्कि उसका सोर्स और क्रेडिबिलिटी को चेक करना एक बड़ा टॉस्क बन जाएगा.

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