US China AI Race: अमेरिका और चीन के बीच एआई की रेस जोर पकड़ती जा रही है. अब इन दोनों के लिए एशिया एक अखाड़ा बन चुका है. अमेरिका नहीं चाहता कि चीन बाकी एशिया और दुनिया में सबसे बड़ा एआई सप्लायर बने. इसके लिए उसने एक नया एक्सपोर्ट प्रोग्राम और दूसरे कई इनीशिएटिव शुरू किए हैं ताकि एशिया में अमेरिकी एआई मॉडल्स और सिस्टम को बढ़ावा दिया जा सके. दूसरी तरफ चीनी कंपनियां सस्ते एआई मॉडल्स तैयार कर रही हैं, जिससे चीन को अपनी टेक्नोलॉजी को ग्लोबल लेवल पर ले जाना का मौका मिल गया है. इस तरह देखा जाए तो दोनों ही सुपर पावर के बीच यह रेस और कड़ी होती जा रही है. दोनों ही एक-दूसरे को पछाड़करएआई के फील्ड में अपना दबदबा बनाना चाह रहे हैं. आइए एक नजर डालते हैं कि इस रेस की शुरुआत कैसे हुई थी.

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कहां से हुई रेस की शुरुआत?

30 नवंबर, 2022 को अमेरिकी टेक फर्म OpenAI ने अपने नए चैटबॉट ChatGPT का ऐलान किया. कंपनी ने कहा कि उसने एक नए मॉडल को तैयार किया है, जो बातचीत कर सकता है. इस ऐलान के साथ ही टेक जगत में हल्ला मच गया. इस चैटबॉट के साथ ही पहले मेनस्ट्रीम लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) का जन्म हो चुका था. अब दुनिया के हर कोने में ChatGPT पहुंच चुका है और रोजाना करोड़ों लोग इसे यूज करते हैं. इसके बाद गूगल, एंथ्रोपिक और परप्लेक्सिटी जैसी कंपनियां भी अपने एआई चैटबॉट ले आईं.

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कैसे आगे निकला अमेरिका?

LLM के लिए जरूरी चिप पर भी अमेरिका का नियंत्रण था. ऐसे सिस्टम के लिए हाई-एंड पावरफुल कंप्यूटर चिप्स की जरूरत पड़ती है, जो अमेरिका के नियंत्रण में थे. इन चिप्स को कैलिफॉर्निया स्थित Nvidia कंपनी ही डिजाइन करती हैं. एआई बूम आने के बाद इस कंपनी की वैल्यूएशन 5 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा हो गई थी. अमेरिका ने रेस में आगे बने रहने के लिए इन चिप्स को चीन एक्सपोर्ट होने से रोक दिया. 2022 में अमेरिका ने इन चिप्स के एक्सपोर्ट पर बैन लगा दिया. साथ ही इन चिप्स को बनाने के लिए जरूरी मशीनों तक चीन को पहुंच बनाने से भी रोक दिया.

चीन का काउंटर अटैक

अब तक रेस में पीछे चल रहे चीन ने जनवरी, 2025 में अपना पहला एआई चैटबॉट DeepSeek लॉन्च किया. यह बिल्कुल चैटजीपीटी की तरह ही काम करता था और इसे यूज करना फ्री था, लेकिन इसकी खास बात यह थी कि इसे बनाने में चैटजीपीटी के मुकाबले बहुत कम लागत आई थी. इससे उथल-पुथल मच गई और एनवीडिया के शेयर एक दिन में ही धड़ाम हो गए. लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि अमेरिका ने जिस चैटबॉट को मोटा पैसा खर्च कर बनाया है, वैसी ही कैपेबिलिटी वाला चैटबॉट इतना सस्ता कैसे बन सकता है. 

कीमत में क्यों रहा इतना अंतर?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका में एआई कंपनियां अपने मॉडल और कोड आदि को लेकर पूरी प्राइवेसी बरतती हैं. दूसरी तरफ चीन में ओपन-सोर्स अप्रोच है. यानी चाइनीज कंपनियां अपने कोड को ऑनलाइन पब्लिश कर देती हैं, जिससे दूसरी कंपनियों को मदद मिल जाती है. उन्हें कोई नया मॉडल बनाने के लिए बिल्कुल शुरुआत से काम शुरू नहीं करना पड़ता. चैटबॉट को लेकर अब भी यह रेस जारी है. अमेरिकी कंपनियों के महंगे प्लान कस्टमर्स को दूसरी तरफ देखने पर मजबूर कर रहे हैं और चीन किफायती कीमत में ऑप्शन लिए तैयार खड़ा है.

रोबोटिक्स में चीन का दबदबा

एआई मॉडल, चैटबॉट और चिप्स को जहां एआई ब्रेन माना जाता है, वहीं रोबोट और ड्रोन आदि को एआई बॉडी में गिना जाता है. एआई ब्रेन में जहां अमेरिका बढ़त बनाए हुए हैं, वहीं एआई बॉडी में चीन का दबदबा रहा है. पिछले 10-15 साल में चाइनीज सरकार ने रोबोटिक्स डेवलपमेंट रिसर्च से लेकर सब्सिडी तक में कोई कमी नहीं छोड़ी है. एक अनुमान है कि चीन में इस वक्त करीब 20 लाख रोबोट काम कर रहे हैं. यह बाकी पूरी दुनिया में एक्टिव सारे रोबोट से ज्यादा हैं. रोबोट के साथ-साथ ह्यूमनॉयड रोबोट के मामले में भी चीन काफी आगे निकल चुका है. ये इंसानों की तरह दिखने और काम करने वाले रोबोट होते हैं. चीन के Chongqing शहर में एक प्लांट में 2,000 रोबोट और ऑटोनोमस व्हीकल काम करते हैं और ये हर मिनट में एक नई कार तैयार कर सकते हैं. यहां इंसान के काम न करने के कारण इस प्लांट को डार्क फैक्ट्री कहा जाता है. 

रोबोट को लेकर भी चीन के सामने चुनौती

चीन रोबोट बॉडी बनाने में सबसे आगे है. रिपीटेटिव टास्क करने के लिए रोबोट में जरूरी सॉफ्टवेयर और चिप्स भी यह खुद बना सकता है, लेकिन जब इन्हें कॉम्प्लेक्स टास्क के लिए तैयार करने की बात आती है तो एडवांस्ड सॉफ्टवेयर और प्रोसेसर की जरूरत पड़ती है, जहां अमेरिका अपना दबदबा बनाए बैठा है.

किसके हाथ लगेगी बाजी?

2022 में शुरू हुई रेस लगातार तेज होती जा रही है और जानकारों का मानना है कि इसमें चांद पर लैंड होने जैसा जीत का कोई सिंगल मोमेंट नहीं आएगा. इसमें पूरी जद्दोजहद लगातार आगे बने रहने की है. बिजली और कंप्यूटिंग की तरह एआई को लेकर भी यह मायने नहीं रखेगा कि इसे किसने बनाया बल्कि यह देखा जाएगा कि किस देश ने सबसे प्रभावी तरीके से इसे अपनी इकॉनमी में शामिल किया है.

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