QR Code Generation: आजकल सब्जी के ठेले से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल्स तक हर जगह पेमेंट के लिए आपको क्यूआर कोड लगा हुआ दिखाई देत है. लोग फोन निकालते हैं स्कैन करते हैं और दो सेकंड में पेमेंट हो जाता है. इतना ही नहीं अब कई दुकानों पर मेन्यू के लिए भी क्यू आर कोड बनवा लेते हैं तो वहीं कुछ जानकारी शेयर करनी हो कोई फार्म भरवाना हो उसके लिए भी क्यूआर कोड बन जाता है. अक्सर लोगों को लगता है कि इसे बनाने के लिए किसी साॅफ्टवेयर या अच्छी कोडिंग की जरूरत पड़ती होगी.
लेकिन इसे बनाना उतना ही आसान है जितना सोशल मीडिया पर कोई फोटो अपलोड करना. आप अपने घर पर बैठकर महज एक मिनट में अपना खुद का क्यूआर कोड तैयार कर सकते हैं. चाहे आपको अपने घर के वाई-फाई का पासवर्ड दोस्तों से शेयर करना हो, अपनी दुकान का डिजिटल कार्ड बनाना हो या किसी इवेंट का लोकेशन लिंक भेजना हो, आप बिना एक रुपया खर्च किए इसे खुद बना सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कैसे बनता है क्यूआर कोड.
ऐसे तैयार करें अपना खुद का क्यूआर कोड
घर पर अपना क्यूआर कोड बनाने के लिए आपको इंटरनेट पर ढेर सारी फ्री वेबसाइट्स और ऐप्स मिल जाएंगी. जैसे कैनवा, क्यूआर कोड मंकी या गूगल क्रोम का इन-बिल्ट फीचर. सबसे पहले अपने फोन या कंप्यूटर के ब्राउजर में इनमें से कोई भी फ्री क्यूआर जनरेटर वेबसाइट खोलें. वहां आपको अलग-अलग ऑप्शन मिलेंगे कि आप कोड में क्या छुपाना चाहते है जैसे कोई वेबसाइट लिंक, अपना फोन नंबर, प्लेन टेक्स्ट, या वाई-फाई डिटेल्स.
अपना मनपसंद ऑप्शन चुनें और नीचे दिए गए बॉक्स में वह जानकारी भर दें. आजकल तो आप इस बोरिंग से दिखने वाले ब्लैक एंड व्हाइट डिब्बे को रंगीन भी बना सकते हैं और इसके बीच में अपनी कंपनी का लोगो या अपनी फोटो भी लगा सकते हैं. बस Generate बटन पर क्लिक करें और आपका कोड तैयार है. इसे PNG या PDF फॉर्मेट में डाउनलोड करें और जहां चाहें प्रिंट करके चिपका दें.
कैसे काम करती है यह टेक्नोलॉजी?
कई बार लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर यह डाॅट्स काम कैसे करते हैं. तो आपको बता दें क्यूआर का पूरा नाम क्विक रिस्पॉन्स है जिसे 1994 में जापान की एक कंपनी ने गाड़ियों के पार्ट्स ट्रैक करने के लिए बनाया था. यह मैट्रिक्स बारकोड तकनीक पर काम करता है. पहले जो लाइन वाले बारकोड आते थे उनमें सिर्फ एक तरफ हॉरिजॉन्टल डेटा स्टोर होता था, इसलिए उनमें बहुत कम जानकारी आ पाती थी.
लेकिन क्यूआर कोड टू-डायमेंशनल यानी 2D होता हैय यानी इसमें आड़ी और खड़ी दोनों लाइनों में डेटा भरा जाता है. कंप्यूटर हमारी भाषा नहीं समझता, ह सिर्फ बाइनरी कोड यानी 0 और 1 की भाषा जानता है. क्यूआर कोड के अंदर मौजूद हर काला डॉट 1 का काम करता है और सफेद खाली जगह 0 का. जब आप कोई लिंक डालते हैं तो जनरेटर उसे इसी जीरो और एक के पैटर्न में बदलकर उन बारीक चौकोर डॉट्स के रूप में सजा देता है.
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कैसे काम करता है स्कैनर?
आपने ध्यान दिया होगा कि हर क्यूआर कोड के तीन कोनों पर बड़े-बड़े चौकोर डिब्बे बने होते हैं. इन्हें पोजीशन मार्कर्स कहते हैं. यह आपके फोन के कैमरे को बताते हैं कि कोड सीधा है या उल्टा, जिससे आप फोन टेढ़ा करके भी स्कैन करें तो वह तुरंत पकड़ लेता है. इसके अलावा इसमें एक बहुत ही कमाल की टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होती है जिसे रीड-सोलोमन एरर करेक्शन कहते हैं. इसी तकनीक की वजह से अगर आपका क्यूआर कोड थोड़ा फट जाए.
उस पर चाय गिर जाए या धूल जम जाए तब भी स्कैनर उसे आसानी से पढ़ लेता है. यह तकनीक कोड के अंदर डेटा की एक बैकअप कॉपी जैसी बना देती है जिससे 30 प्रतिशत तक कोड खराब होने पर भी डेटा सेफ रहता है. हालांकि घर पर कोड बनाते वक्त हमेशा ध्यान रखें कि अगर आप उसे लंबे समय के लिए प्रिंट कर रहे हैं. तो स्टैटिक कोड ही चुनें जो कभी एक्सपायर नहीं होता.
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