सोशल मीडिया पर इन दिनों 1980s का रेट्रो लुक वाला AI फोटो ट्रेंड जोरों पर है. लोग अपनी सेल्फी AI टूल्स में डालकर उन्हें बड़े बाल, विंटेज कपड़े, पुराने स्टूडियो बैकड्रॉप और फिल्म जैसे टेक्सचर वाले पोर्ट्रेट में बदल रहे हैं. प्रोसेस दिखने में बेहद आसान लगता है यानी फोटो अपलोड करो, प्रॉम्प्ट टाइप करो और कुछ सेकंड में इमेज तैयार. इसके पीछे काम करने वाला फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बिजली खाता है, गर्मी पैदा करता है और ठंडा होने के लिए पानी पीता है...

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एक AI इमेज में कितनी बिजली लगती है?

इसका कोई एक फिक्स नंबर नहीं है. AiEnsured के CTO डॉ. श्रीनिवास पद्मनाभुनी का अनुमान है कि एक AI इमेज बनाने में करीब 1.2 वॉट-घंटे बिजली खर्च हो सकती है. मास्कटेक ग्रुप के CTO रित्विक बताब्याल कहते हैं कि यह नंबर मॉडल और डिप्लॉयमेंट के हिसाब से वॉट-घंटे के फ्रैक्शन से लेकर कई वॉट-घंटे तक हो सकता है.

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AI&Beyond के को-फाउंडर जसप्रीत बिंद्रा का अनुमान 0.1 से 4 वाट-घंटे प्रति इमेज का है. यह अंतर इसलिए है क्योंकि मॉडल का साइज, हार्डवेयर और वर्कलोड का असर एनर्जी फुटप्रिंट पर पड़ता है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, इमेज जनरेशन सिंपल टेक्स्ट-बेस्ड टास्क्स से कहीं ज्यादा एनर्जी-इंटेंसिव है. 2026 की UN यूनिवर्सिटी की एक एसेसमेंट में अनुमान लगाया गया कि एक टिपिकल AI-जनरेटेड इमेज को बेसिक टेक्स्ट-क्लासिफिकेशन टास्क से करीब 1,450 गुना ज्यादा एनर्जी लगती है.

असली समस्या एक इमेज नहीं बल्कि स्केल

एक आम इंसान के लिए कुछ वाट-घंटे बहुत छोटी मात्रा है, लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है जब यह मास एक्टिविटी बन जाती है. लोग आमतौर पर एक ही इमेज नहीं बनाते. पहला वर्जन चेहरा सही न दिखने पर रिजेक्ट हो जाता है, दूसरे प्रॉम्प्ट में कपड़े बदले जाते हैं और तीसरे में लाइटिंग. कई वर्जन बनाने के बाद फाइनल इमेज शेयर होती है.

एक वायरल ट्रेंड इसलिए लाखों इन्फरेंस टास्क्स में बदल जाता है. यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी (UNU) का अनुमान है कि 2022 और 2023 में टेक्स्ट-टू-इमेज सिस्टम्स से 15 बिलियन से ज्यादा इमेज जनरेट हुईं. 2023 में रोजाना करीब 34 मिलियन AI इमेज बन रही थीं. मौजूदा 1980s ट्रेंड में कितनी इमेज बनीं, इसका कोई भरोसेमंद सार्वजनिक आंकड़ा नहीं है, इसलिए इसका कुल एनर्जी या वाटर फुटप्रिंट बताना अटकलबाजी होगी.

पानी की लागत: दो चम्मच से लेकर बड़े संकट तक

बिजली सिर्फ आधी कहानी है. डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए पानी की जरूरत होती है और बिजली बनाने में भी पानी लगता है. UNU की 2026 एसेसमेंट के मुताबिक, 2030 तक AI चलाने वाले डेटा सेंटर्स को सालाना 945 टेरावाट-घंटे बिजली की जरूरत हो सकती है.

इससे जुड़ा वॉटर फुटप्रिंट 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है, जो सब-सहारन अफ्रीका के 1.3 बिलियन लोगों की सालाना घरेलू पानी की जरूरत के बराबर है. लैंड फुटप्रिंट 14,500 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा हो सकता है.

एक सिंगल AI इमेज का वाटर फुटप्रिंट कितना है?

UNU का अनुमान है कि एक AI इमेज का बिजली-जुड़ा वाटर फुटप्रिंट करीब 29 मिलीलीटर है, यानी लगभग दो चम्मच. यह नंबर डेटा सेंटर की लोकेशन, कूलिंग टेक्नोलॉजी, लोकल क्लाइमेट, बिजली का मिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की एफिशिएंसी पर निर्भर करता है.

IEA के मुताबिक, एक AI इमेज बनाने में करीब 23 मिलीलीटर पानी लगता है. यह एक इमेज के लिए छोटा लगता है, लेकिन जब रोजाना करोड़ों इमेज बनती हैं, तो सालाना खर्च 200 ओलंपिक-साइज स्विमिंग पूल भरने के बराबर हो सकता है.

एनर्जी और पानी के अलावा सेल्फी का डेटा कहां जाता है?

इस ट्रेंड का एक और पहलू है जिस पर कम बात होती है- आपकी फोटो का क्या होता है. रेट्रो लुक पाने के लिए आपको एक साफ, अच्छी रोशनी वाली सेल्फी AI टूल को देनी पड़ती है, कई बार कई फोटो.

सिक्योरिटी रिसर्चर्स महीनों से चेतावनी दे रहे हैं कि हाई-रिजॉल्यूशन सेल्फी में चेहरे की ज्योमेट्री, स्किन टेक्सचर और क्लोज-अप शॉट्स में उंगलियों के निशान भी निकाले जा सकते हैं. पासवर्ड की तरह चेहरा रीसेट नहीं हो सकता.

सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई प्लेटफॉर्म अपलोड की गई इमेज को रख लेते हैं. बहुत कम यूजर्स टर्म्स एंड कंडीशन्स पढ़ते हैं कि उनकी फोटो अगले मॉडल को ट्रेन करने में इस्तेमाल हो सकती है या नहीं.

इस पर रेगुलेशन बहुत कमजोर है यानी कुछ खास कानूनों को छोड़कर कोई सख्त सामान्य नियम नहीं है जो कंपनी को आपकी फन के लिए अपलोड की गई सेल्फी दोबारा इस्तेमाल करने से रोके.

AI बूम सिर्फ सॉफ्टवेयर की कहानी नहीं

AI के बढ़ने के साथ डेटा सेंटर कैपेसिटी की मांग भी तेजी से बढ़ रही है. IEA के अप्रैल 2026 के मुताबिक, 2025 में ग्लोबल डेटा सेंटर बिजली की खपत तेजी से बढ़ी और AI के विस्तार के साथ यह और तेजी से बढ़ने वाली है. पांच बड़ी टेक कंपनियों का कैपिटल एक्सपेंडिचर 2025 में 400 बिलियन डॉलर से ज्यादा था और 2026 में इसमें 75% और बढ़ोतरी की उम्मीद है.

IEA की रिपोर्ट के मुताबिक, डेटा सेंटर्स से बिजली की खपत 2025 में 485 TWh से बढ़कर 2030 तक 950 TWh हो सकती है, जो ग्लोबल बिजली मांग का करीब 3% होगा. AI-फोकस्ड डेटा सेंटर्स की बिजली खपत 2025 में 50% बढ़ी.

UNU का अनुमान है कि 80 से 90 प्रतिशत AI एनर्जी इस्तेमाल इन्फरेंस में होता है यानी जब डिप्लॉयड मॉडल असल में इस्तेमाल किए जा रहे होते हैं, न कि ट्रेनिंग के दौरान. रोजाना करीब 2.5 बिलियन ChatGPT प्रॉम्प्ट्स चलते हैं, जो दिखाता है कि रोजमर्रा का AI इस्तेमाल कैसे एक बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर लोड में बदल जाता है.

तो क्या AI इमेज बनाना बंद कर देना चाहिए?

एक AI-जनरेटेड इमेज का एनवायर्नमेंटल फुटप्रिंट रोजमर्रा के कई एमिशन और रिसोर्स इस्तेमाल की तुलना में काफी छोटा है. असली सवाल यह है कि जब AI इमेज जनरेशन इतना आसान हो जाता है कि लोग अरबों इमेज बनाते हैं, तो क्या होता है. यहीं एफिशिएंसी गेन मायने रखती है.

AI मॉडल्स को ज्यादा एफिशिएंट बनाया जा सकता है, हार्डवेयर बेहतर हो सकता है, डेटा सेंटर्स अलग कूलिंग टेक्नोलॉजी इस्तेमाल कर सकते हैं और ऑपरेटर्स यह चुन सकते हैं कि फैसिलिटी कहां बनाएं और कौन से पावर सोर्स इस्तेमाल करें.

मासटेक ग्रुप के रित्विक बताब्याल कहते हैं, 'जेनरेटिव AI ने इमेज क्रिएशन को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन हमें डिजिटल सुविधा को जीरो फिजिकल कॉस्ट नहीं समझना चाहिए.' रित्विक के मुताबिक, पूरे AI स्टैक की एफिशिएंसी लगातार सुधारनी होगी.