उत्तराखंड में वन्यजीवों के बढ़ते हमलों ने पहाड़ी इलाकों में लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है. सर्द मौसम के बीच भालुओं की सक्रियता से ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल है. हालत यह है कि पौड़ी जिले का एक गांव पूरी तरह खाली हो गया है. पोखड़ा क्षेत्र के बस्ताग गांव में रहने वाले आखिरी परिवार ने भी भालुओं के आतंक से तंग आकर अपना पैतृक घर छोड़ दिया.

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पणिया ग्राम सभा के तोक बस्ताग में रहने वाले हरीश प्रसाद नौटियाल का परिवार पिछले पांच वर्षों से गांव को आबाद किए हुए था. हरीश प्रसाद अपनी दो दुधारू गायों, बैलों की एक जोड़ी और दो बकरियों के सहारे परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे. लेकिन बीते एक सप्ताह के भीतर भालू ने उनके सभी छह मवेशियों को मार डाला. हालात इतने भयावह हो गए कि भालू घर के आंगन तक आने लगा और वहीं डेरा जमाए रहने लगा.

लगातार हो रहे हमलों से परिवार की हिम्मत टूट गई. सुरक्षा को देखते हुए हरीश प्रसाद, उनकी पत्नी जसोदा देवी, बेटा संजय और तलाकशुदा बेटी शांति को गांव छोड़ना पड़ा. फिलहाल यह परिवार पड़ोसी गांव पणिया में एक ग्रामीण के घर शरण लेकर रह रहा है. उनके जाने के बाद बस्ताग गांव पूरी तरह वीरान हो गया है.

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हरीश प्रसाद का कहना है कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि भालू उनके गांव छोड़ने की वजह बनेगा. मवेशियों के मरने से उनका एकमात्र आर्थिक सहारा भी खत्म हो गया है. जसोदा देवी ने बताया कि वन्यजीवों की लगातार आवाजाही से परिवार भय के साये में जी रहा था, इसलिए मजबूरी में पैतृक घर छोड़ना पड़ा.

ग्राम प्रधान हर्षपाल सिंह नेगी के अनुसार, करीब 15 वर्ष पहले तक बस्ताग में 18 परिवार रहते थे. सड़क और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में धीरे-धीरे लोग शहरों की ओर पलायन करते गए. कोरोना काल में कुछ लोग लौटे जरूर, लेकिन स्थायी रूप से कोई नहीं रुका. अब वन्यजीवों के बढ़ते खतरे ने हालात और बिगाड़ दिए हैं.

उधर, चमोली जिले में भी भालू के हमले की एक और घटना सामने आई है. कर्णप्रयाग क्षेत्र के सिमली में जंगल से चारा लेने गई 65 वर्षीय महिला पर भालू ने हमला कर दिया. महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है. वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में गश्त बढ़ाने और लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है.