माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने वाले उत्तरायणी कौथिक महोत्सव की तैयारियां विधिवत रूप से शुरू हो गई हैं. सेवा संकल्प फाउंडेशन की फाउंडर ट्रस्टी गीता धामी ने परेड ग्राउंड, देहरादून में 5 फरवरी से 8 फरवरी 2026 तक प्रस्तावित उत्तरायणी कौथिक महोत्सव की सफलता के लिए विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की. 

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श्रद्धा और आस्था के साथ किए गए इस पूजन के माध्यम से उन्होंने महोत्सव के सफल, सुव्यवस्थित और मंगलमय आयोजन की कामना की. पूजन कार्यक्रम के उपरांत गीता धामी ने पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सामाजिक दायित्व का संदेश देते हुए वृक्षारोपण भी किया.

'प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा देना सामूहिक जिम्मेदारी'

उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक आयोजनों के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण की भावना को बढ़ावा देना भी हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है. इसके पश्चात सेवा संकल्प फाउंडेशन से जुड़े पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक आयोजित कर महोत्सव की तैयारियों की विस्तृत समीक्षा की गई.

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फाउंडर गीता धामी ने दिए आवश्यक दिशा-निर्देश

बैठक में गीता धामी ने आयोजन को अधिक प्रभावी, सुव्यवस्थित और जनसरोकारों से जोड़ने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए. उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तरायणी कौथिक महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, परंपराओं और लोककलाओं को देशभर में पहचान दिलाने का एक सशक्त मंच है.

गीता धामी ने जानकारी दी कि इस वर्ष के उत्तरायणी कौथिक महोत्सव में उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों की जनजातीय संस्कृतियों की भव्य प्रस्तुतियां देखने को मिलेंगी. विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी भारत की सांस्कृतिक झलक, वहां की परंपराएं, लोकनृत्य और सांस्कृतिक विविधता को मंच पर प्रदर्शित किया जाएगा. इससे देश की “एकता में विविधता” की भावना को मजबूती मिलेगी और विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी समझ बढ़ेगी.

'स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर देना उद्देश्य'

उन्होंने कहा कि उत्तरायणी कौथिक महोत्सव का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, लोककला, लोकसंगीत और पारंपरिक विरासत को जन-जन तक पहुंचाना है. साथ ही, स्थानीय कलाकारों और प्रतिभाओं को एक सशक्त मंच प्रदान कर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना भी इस आयोजन की प्रमुख सोच है. सेवा संकल्प फाउंडेशन का यह प्रयास समाज में सांस्कृतिक चेतना, सहभागिता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.