उत्तराखंड अब पहाड़ों और नदियों से मिलने वाली जलविद्युत के साथ धरती के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी को भी बिजली उत्पादन का नया स्रोत बनाने की तैयारी कर रहा है. उत्तरकाशी के गंगनानी में राज्य की पहली प्रस्तावित जियोथर्मल यानी भू-तापीय विद्युत परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. आइसलैंड की जियोथर्मल इंजीनियरिंग कंपनी Verkís ने उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (यूजेवीएनएल) को परियोजना की शुरुआती इनिशियल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (आईपीआर) सौंप दी है. अब परियोजना के अगले चरण में विस्तृत अध्ययन और डीपीआर तैयार करने के लिए करीब 3 करोड़ रुपये की जरूरत बताई गई है.

Continues below advertisement

गंगनानी परियोजना के शुरुआती चरण में 10 मेगावाट बिजली उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है. हालांकि यह अभी अंतिम उत्पादन क्षमता नहीं है. जमीन के नीचे मौजूद गर्म पानी और चट्टानों में वास्तव में कितनी तापीय ऊर्जा है, इसका पता विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे, परीक्षण और ड्रिलिंग के बाद ही चल सकेगा. यदि भूमिगत तापीय संसाधन उम्मीद के मुताबिक मजबूत मिले तो भविष्य में परियोजना की क्षमता बढ़ाने की संभावना भी बन सकती है.

यह भी पढ़ें: सावन में संजय निषाद ने मछली को बताया 'शाकाहारी', बोले- 'बिना लहसुन-प्याज के बनाएं'

Continues below advertisement

पहले समझिए, जियोथर्मल ऊर्जा क्या है

जियोथर्मल ऊर्जा धरती के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी से पैदा की जाती है. कई इलाकों में जमीन के नीचे गर्म पानी और अत्यधिक गर्म चट्टानें मौजूद होती हैं. इस गर्मी को तकनीकी प्रक्रिया के जरिए सतह तक लाकर बिजली उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह सौर ऊर्जा की तरह धूप और पवन ऊर्जा की तरह हवा की गति पर निर्भर नहीं रहती. अगर जमीन के नीचे लगातार पर्याप्त तापीय ऊर्जा उपलब्ध हो तो इससे लंबे समय तक बिजली उत्पादन संभव हो सकता है.

उत्तराखंड में जियोथर्मल ऊर्जा की संभावना नई बात नहीं है. राज्य में 150 से अधिक प्रमुख गर्म पानी के प्राकृतिक स्रोत बताए जाते हैं. तपोवन-विष्णुगाड, गौरीकुंड, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ समेत कई क्षेत्रों में ऐसे स्रोत मौजूद हैं. लेकिन केवल गर्म पानी का स्रोत मिलना बिजली उत्पादन की गारंटी नहीं है. इसके लिए यह पता लगाना जरूरी है कि जमीन के नीचे तापमान कितना है, पानी और दबाव कितना है तथा तापीय ऊर्जा लगातार उपलब्ध रह सकती है या नहीं.

गंगनानी में अब होगा विस्तृत वैज्ञानिक परीक्षण

गंगनानी में आईपीआर मिलने के बाद अब परियोजना के अगले चरण में विस्तृत भू-वैज्ञानिक और भू-भौतिकीय सर्वे किया जाएगा. इसके जरिए जमीन के नीचे मौजूद तापीय संसाधनों की वास्तविक स्थिति समझने की कोशिश होगी. संभावित स्थानों की पहचान के बाद वहां टेस्ट ड्रिलिंग की जाएगी. ड्रिलिंग के दौरान जमीन के नीचे मौजूद गर्म पानी और चट्टानों का तापमान, गहराई और ऊर्जा क्षमता जांची जाएगी.

इन परीक्षणों से यह पता चलेगा कि गंगनानी में प्रस्तावित 10 मेगावाट का प्लांट तकनीकी और आर्थिक रूप से कितना व्यवहार्य है. अगर जांच में पर्याप्त तापमान, गर्म पानी, दबाव और लगातार तापीय ऊर्जा उपलब्ध होने के संकेत मिलते हैं तो परियोजना को व्यावसायिक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकता है. वहीं संसाधन अपेक्षा के मुताबिक नहीं मिले तो उत्पादन क्षमता या परियोजना की योजना में बदलाव भी संभव है.

3 करोड़ की मांग प्लांट बनाने के लिए नहीं

अगले चरण के लिए मांगे गए करीब 3 करोड़ रुपये को परियोजना निर्माण की लागत नहीं समझना चाहिए. यह रकम विस्तृत अध्ययन और डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया के लिए मांगी गई है. इसमें क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण, तकनीकी जांच, संभावित साइट की पहचान, परीक्षण और परियोजना की व्यवहार्यता का आकलन शामिल होगा.

डीपीआर तैयार होने के बाद ही परियोजना की कुल अनुमानित लागत, निर्माण की तकनीक, प्लांट की वास्तविक क्षमता और बिजली उत्पादन की आर्थिक व्यवहार्यता ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी. यानी फिलहाल 3 करोड़ रुपये शुरुआती अध्ययन के अगले चरण के लिए हैं, पूरे जियोथर्मल प्लांट के निर्माण के लिए नहीं.

10 मेगावाट लक्ष्य है, गारंटी नहीं

गंगनानी परियोजना के पहले चरण के लिए 10 मेगावाट उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इसे अभी अंतिम क्षमता नहीं माना जा सकता. जियोथर्मल परियोजना में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जमीन के नीचे मौजूद तापीय भंडार की क्षमता का होता है. यदि ड्रिलिंग और वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चलता है कि वहां पर्याप्त तापीय ऊर्जा लगातार उपलब्ध है, तभी बड़े स्तर पर बिजली उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ना संभव होगा.

यानी आने वाले चरण में असली तस्वीर जमीन के नीचे की जांच से सामने आएगी. यदि भूमिगत संसाधन अनुमान से ज्यादा मजबूत मिलते हैं तो भविष्य में परियोजना का विस्तार भी किया जा सकता है.

2025 में नीति बनी, अब गंगनानी को मिली रफ्तार

उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2025 में जियोथर्मल ऊर्जा नीति लागू की थी. इसके बाद गंगनानी परियोजना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी यूजेवीएनएल को दी गई. इससे पहले जनवरी 2025 में उत्तराखंड सरकार और आइसलैंड की कंपनी Verkís के बीच जियोथर्मल ऊर्जा के विकास को लेकर समझौता हुआ था. आइसलैंड दुनिया में जियोथर्मल ऊर्जा के बड़े इस्तेमाल के लिए जाना जाता है और इसी तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ उत्तराखंड में लेने की कोशिश की जा रही है.

अब Verkís की तकनीकी मदद से गंगनानी में शुरुआती अध्ययन पूरा किया गया है और आईपीआर यूजेवीएनएल को सौंप दी गई है. इसके बाद विस्तृत सर्वे और डीपीआर की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है.

तपोवन से अलग है गंगनानी की परियोजना

उत्तराखंड के दूसरे हिस्सों में भी जियोथर्मल ऊर्जा की संभावनाओं को लेकर अध्ययन होते रहे हैं. खासकर तपोवन क्षेत्र में भूमिगत गर्मी और गर्म पानी के स्रोतों को लेकर संभावनाएं सामने आती रही हैं. लेकिन गंगनानी को फिलहाल बिजली उत्पादन की एक विशिष्ट प्रस्तावित परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है.

यानी राज्य में अलग-अलग गर्म पानी वाले क्षेत्रों की संभावनाओं को एक ही परियोजना नहीं माना जा सकता. गंगनानी में अब बिजली उत्पादन के लिए आईपीआर तैयार हो चुकी है, जबकि आगे के वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर इसकी वास्तविक क्षमता तय होगी.

उत्तराखंड को मिल सकता है ऊर्जा का नया विकल्प

अगर गंगनानी परियोजना तकनीकी और आर्थिक रूप से सफल होती है तो उत्तराखंड को बिजली उत्पादन का एक नया विकल्प मिल सकता है. जलविद्युत पर बड़ी निर्भरता वाले राज्य में जियोथर्मल ऊर्जा अतिरिक्त स्रोत के रूप में काम कर सकती है. इसके अलावा यह मौसम पर कम निर्भर ऊर्जा स्रोत हो सकता है, जिससे लगातार बिजली उत्पादन की संभावना बनती है.

इसके साथ ही परियोजना से सर्वे, ड्रिलिंग, निर्माण और संचालन के दौरान स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं. गर्म पानी वाले क्षेत्रों में हॉट स्प्रिंग और वेलनेस टूरिज्म को विकसित करने की संभावनाएं भी इससे जुड़ सकती हैं.

हिमालय में ड्रिलिंग सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि परियोजना की राह आसान नहीं है. हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय परिस्थितियां जटिल हैं और यहां ड्रिलिंग तथा निर्माण का काम मैदानी इलाकों की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण और महंगा हो सकता है. मशीनरी और निर्माण सामग्री को पहाड़ी क्षेत्र तक पहुंचाना भी कठिन होगा.

उत्तराखंड भूकंपीय दृष्टि से भी संवेदनशील राज्य है. इसलिए जमीन के भीतर मौजूद तापीय संसाधनों के इस्तेमाल से पहले विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव और परियोजना की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं का आकलन बेहद जरूरी होगा. परियोजना का अंतिम फैसला केवल बिजली उत्पादन क्षमता देखकर नहीं, बल्कि तकनीकी व्यवहार्यता, लागत, पर्यावरणीय असर और लंबे समय के आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर करना होगा.

अब अगला कदम टेस्ट ड्रिलिंग और डीपीआर

गंगनानी में जियोथर्मल बिजली परियोजना की शुरुआती तकनीकी रूपरेखा तैयार हो चुकी है. आईपीआर यूजेवीएनएल को मिल गई है और अब विस्तृत भू-वैज्ञानिक अध्ययन, संभावित साइटों की पहचान, टेस्ट ड्रिलिंग और तापीय संसाधनों की क्षमता जांचने का काम महत्वपूर्ण होगा. इसके बाद इन परिणामों के आधार पर डीपीआर तैयार की जाएगी.

यदि जमीन के नीचे पर्याप्त तापमान, गर्म पानी, दबाव और लगातार तापीय ऊर्जा उपलब्ध मिली तो गंगनानी उत्तराखंड में जियोथर्मल बिजली के नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है. लेकिन फिलहाल 10 मेगावाट को अंतिम उत्पादन क्षमता नहीं, बल्कि परियोजना का शुरुआती लक्ष्य माना जाना चाहिए. अंतिम तस्वीर वैज्ञानिक परीक्षण और डीपीआर तैयार होने के बाद ही साफ होगी.

यह भी पढ़ें: अमेठी में प्रेमी युगल की कुएं में मिली लाश, दो दिन से थे लापता